सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

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आन्दोलन के बाद आत्मघात :अरविन्द केजरीवाल की राजनीती “Jagran Junction Forum”

Posted On: 23 Oct, 2012 Others में

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जे.पी. के आन्दोलन के बाद से एक लम्बा समय बीत गया नई पीढ़ी को भी पुराने ढर्रे पर चलने की आदत सी हो चुकी थी. पिज्जा बर्गर से भूख, मिनरल वाटर और बीयर-वाईन से प्यास मिटाने वाली आज की पीढ़ी ” सब चलता है ” को जीवन का मूल वाक्य और लक्ष्य मान कर चल रही थी ..ये वही मूल वाक्य है जिससे भ्रष्टाचार की बेल पनपी और आज विशाल कल्पवृक्ष का रूप ले चुकी है जिससे हर नए कर्मनिष्ठ और समर्पित भ्रष्टाचारी की इच्छा को तथास्तु का वरदान मिलता रहा है..इस बेल को अधूरी आज़ादी ने बोया और धूर्त मालियों ने इससे खाद पानी उपलब्ध कराया , समय समय पर कुछ जागरूक माली आये जिन्होंने इससे काट छाट कर सुन्दर बनाने का प्रयास किया पर उनके बाद उनके शिष्यों ने फिर से इस कल्पवृक्ष को मनमानी शक्ल देकर और विशाल बना दिया और पुनः इसकी जिम्मेदारी पुराने मालियों के वंशजो के हाथो सौप दी जो आज हमारे सामने एक अप्रत्यक्ष निरंकुश सत्ता के रूप में प्रत्यक्ष हो रही है .

इस पुरे सफ़र का दुखद पहलु ये रहा ..की आततायी निरंकुश स्वतंत्रता के लिए लड़े गए महान आंदोलनों और आज़ादी के बाद हुए निरंकुशता विरोधी आंदोलनों की कहानी नई पीढ़ी को सुनाने और सिखाने वाले खुद ही इस कल्पवृक्ष से अपनी इच्छा पूर्ति में लग गए ,,और नई पीढ़ी को वो सारे संघर्ष बुजुर्गो का फ़र्ज़ या एक कहानी के रूप में याद रह गए जिन्हें पढ़कर आनंद तो लिया जा सकता है पर कुछ सीखने की जरुरत नहीं समझी गई ..और परिणाम आज हमारे सामने है की भ्रष्टाचार की सुनामी भविष्य को ग्रसने की ओर उन्मुख है ..

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वैसे तो इस राष्ट्र की सेवा में न जाने कितने ही माली दिन रात गुमनाम रूप से सेवा में लगे है जिसका परिणाम ये है की राष्ट्र अभी तक वीरान नहीं हुआ..पर कुछ ऐसे भी लोग रहे जिन्होंने पुरे राष्ट्र को इस भ्रष्टाचारी कल्पवृक्ष को नष्ट करने के लिए जगाना अधिक उचित समझा इनमे कुछ नाम हम ले सकते है .. जैसे  मेधा पाटकर , विनोवा भावे , के. एन. गोविन्दाचार्य , बाबा रामदेव ,अन्ना हजारे , अरविन्द केजरीवाल इत्यादि .. इनके अपने मत ,सिद्धांत ,लक्ष्य जो भी रहे हो पर इसमें दो राय नहीं की इन्होने देश के जनमानस को हिलाने का काम किया और एक समय तो ऐसा लगा की पूरा देश मिलकर इस कल्पवृक्ष को हिलाकर कुछ शाखाये तो गिरा ही देगा .पर ऐसा कुछ हुआ नहीं ,मुझे वो कहानी याद आई जिसमे लकड़ी के गट्ठर को एक किसान के लड़के अलग -अलग तोड़ने का प्रयास करते है और असफल रहते है ..

बहरहाल यहाँ वर्तमान के सबसे अधिक चर्चित माली अरविन्द केजरीवाल के बारे में बात हो रही है , अरविन्द और अन्ना ने एक समय लगभग सारे देश में एक जान सी फूक दी थी और नौजवानों ने एक थ्रिल के रूप में ही सही कुछ नया अनुभव मानकर ही निजी आनंद के लिए और कही- कही तो अन्ना और अरविन्द के बीच में अपना पोस्टर लगाने के लिए सडको पर उतर कर आन्दोलन किया ..मुझे कोई संकोच ये कहने में नहीं है की ये जोश छणिक था . आन्दोलन का भाव इस उत्साह के सैलाब में पीछे छूट गया .. अन्ना ने इस बात को शायद समझा होगा तभी उन्होंने जनजागरण के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए सामाजिक कार्यो में ही लगे रहने पर बल दिया और राजनीती से स्वयं को दूर रखने में भलाई समझी ..यही काम गाँधी जी ने किया यही जे.पी. ने और लोहिया ने किया . क्योकि ये समझते थे की किसी भी परिवर्तन के लिए एक प्रयास काफी नहीं होता कुछ पत्थरो को नीव में जाना ही होता है अन्ना ने भी यही किया. लेकिन अरविन्द जी ने राह बदल दी उन्होंने एक कठिन संकल्प ले लिया जिसका परिणाम जहा तक मेरी आशंका है पुरे आन्दोलन पर पड़ेगा और पड़ भी रहा है …

arvnd2एक बात पर स्पष्ट हु की अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना का पूरा उपयोग नहीं किया और अधूरी ताकत के साथ ही कूद पड़े और ऐसा करके उन्होंने न केवल आन्दोलन को कमजोर किया बल्कि देश के सामने भी एक गलत सन्देश दे दिया की उनके संगठन में आपसी मतभेद है .. ये समय राजनीती करने का नहीं था ये समय जनता में आये उबाल को एक सैलाब में बदल देने का था ..अन्ना जैसा दधिची जब अपनी अस्थिया देने को तैयार था तो मेरा मत है की अरविन्द को वज्र बनाना चाहिए था ..

पर अरविन्द ने ऐसा नहीं किया पूरा राष्ट्र एक सुर में अन्ना को गाँधी मानकर एक आस लगा चूका था पर अरविन्द की हड़बड़ी ने उसे निराश किया …अभी जनता सोच रही थी और उसे जागरूक करना दिल्ली की दो-चार सीट जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण ,परिणामदायक और लाभकारी कार्य था जिसे अन्ना और अरविन्द के राह अलग करने को ठेस लगी क्योकि ये प्रत्यक्ष था की अन्ना की कार्यकारी शक्ति केजरीवाल ही है ..


अरविन्द के साथ कुछ नाम ऐसे है जिनपर आसानी से ऊँगली उठ सकती है , ऐसे में उन्होंने सत्ता को भी मौका दे दिया.
एक राजनीतिक दल के रूप में समय समय पर देश हित का ढिंढोरा पीटने और सत्ता से सुरक्षा की गारंटी लेने वालो का हश्र जनता देख चुकी है .. एक बेहतरीन मौका अरविन्द को मिला था वो इतिहास से सबक लेते और गाँधी, जे.पी.,लोहिया के चेलो ने जैसा उनके आंदोलनों का हश्र किया उससे सबक लेते तो बेहतर होता ..आज अगर उन आंदोलनों से निकले नेताओं की बात करे तो उन्हें जनतंत्र का गद्दार कहने में संकोच नहीं होगा ..

arvnd1अरविन्द ने सत्ता को आन्दोलन से ऊपर मान लिया और राजनीतिक दल के गठन को प्राथमिकता दी इस तरह उन्होंने आन्दोलन का बहुत नुक्सान कर दिया है ऐसा मेरा मानना है, सत्ता की तारक शक्ति कितनी भी कम हो पर उसकी मारक शक्ति बहुत होती है गाँधी जी इस बात को समझते थे इसी कारन उन्होंने जनजागरण को अपना हथियार बनाया , बदलाव केवल जनमत ही कर सकता है कोई नेता नहीं और अभी कार्य इसी जनमत के निर्माण का चल रहा था वो भी घुटनों के बल पर था ,इसे ऊँगली पकड़ कर उठाये बिना गोद में लेकर चलने की गलती अरविन्द ने कर दी है …ये प्रभावी होगी इसपर मुझे पूर्ण संदेह है.. यद्यपि मै अरविन्द की हिम्मत और उनकी कर्तव्यनिष्ठा के प्रति नतमस्तक हु पर इस बात से मूह नहीं मोड़ा जा सकता की उन्होंने जन जागरण के आन्दोलन को कमजोर किया है .क्योकि  राजनीति आन्दोलन नहीं होती ..और आन्दोलन राजनीती नहीं होता ..

जनता जो खिडकियों से झाकने लगी थी उसे दरवाजे खोलने से पहले ही सूरज को ढक दिया और जो गलियों में उतर कर मुख्य मार्ग तक पहुच गए थे वो वापस घरो की तरफ लौटने लगे है….. इन्हें अब कौन वापस बुलाएगा …..?

अब, ना अन्ना है ,ना जन है , ना जनलोकपाल है
परदे पर केवल सरकार है और टीम केजरीवाल है………………………………………..


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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Harish Bhatt के द्वारा
October 28, 2012

निखिल जी बेस्ट ब्लॉगर के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई.

seemakanwal के द्वारा
October 28, 2012

निखिल जी आप के इस कथन से मई पूर्ण रूप से सहमत हूँ अन्ना जी का पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया .सारगर्भित लेख . सम्मान प्राप्ति की हार्दिक शुभकामना

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 28, 2012

    सीमा जी सहमती प्रकट करने के लिए और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

shashibhushan1959 के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय निखिल जी, सादर ! बहुत विश्लेषणात्मक रचना ! अगर हम यह मानकर चलें की श्री केजरीवाल सत्ता के लोभी हैं, तो फिर उनके इस अभियान का कोई भी अर्थ निकाला जा सकता है, पर अगर यह मान लें की वे निश्छल रूप से राजनितिक परिवर्तन चाहते हैं तो इस अभियान का वह अर्थ कदापि नहीं रह जाएगा जो आप कह रहे हैं ! आप की तरह देश की जनता भी आशंकाओं से ग्रस्त है ! आशंकाएं अवसाद देती हैं, उत्साह नहीं ! श्री केजरीवाल ने जो आग जलाई है, उस आग ने प्रारम्भावस्था में ही अनेक सांप-बिच्छुओं को विचलित कर दिया है ! अभी तो इस आग का प्रचंड रूप बाकी है ! समय जब करवट बदलता है तो पलक झपकते परिस्थितियाँ बदल जाती हैं ! रचना के साप्ताहिक सम्मान प्राप्ति पर मेरी हार्दिक बधाई !

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 28, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी अभिवादन स्वीकार करे … आप सभी वरिष्ठ महानुभाव शायद मेरी बात को समझ नहीं प् रहे … बात व्यवस्था परिवर्तन की हो रही है .. और व्यवस्था परिवर्तन व्यवस्था का अंग बनकर नहीं हो सकता .. राजनीतिक कदम के विरुद्ध मै इसलिए नहीं हु की अरविन्द जी की नियत पर संदेह है बल्कि इसलिए हु की अभी वे आन्दोलन से जो हवा बनी उसी हवा पर कदम रखकर अपने लक्ष्य निर्धारित कर रहे है ..अन्ना जमीं की लड़ी चाहते थे ताकि पुरे देश में पहले एक आधार तो बन जाये ..फिर अगला कदम उठाया जायेगा … पर जल्दबाजी में अरविन्द जी ने अन्ना की ताकत और उनकी अपील का फायदा नहीं उठाया … वे ये भूल गए की अन्ना तो आजके गाँधी बन गए (मेरा ये मत नहीं है ) पर अरविन्द नेहरु नहीं है उनकी अपील मीडिया के भरोसे पर है ..और मीडिया किसी का सगा नहीं है ये सभी जानते है .. राजनीती में आकर दो-चार सीटों को प्रभावित करके अरविन्द जी का कोई फायदा नहीं होगा पर आप जिस प्रचंड आग की कल्पना कर रहे है वह बुझ जाएगी … मै विनम्रता से कहना चाहता हु की आशंकाए अवसाद को जन्म नहीं देती .. अवसाद हमेशा भ्रम के गर्भ से जन्म लेता है ..भ्रमपूर्ण आशंकाए नुकसानदायक होती है पर आशंकाए अक्सर हमें सचेत भी करती है … और भ्रम ये है की हम इन साप बिच्छुओ से हो रही कुश्ती को देखकर हर्ष व्यक्त कर रहे है …जरुरत थी करोणों अरविन्द और अन्ना जैसी लाठिया बनाने की जो करोणों साप बिच्छुओ अजगरो से एक साथ लड़ सके कीड़े मकोडो से लड़ने में समय ताकत व्यर्थ करना मुझे समझ में नहीं आता ….

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
October 27, 2012

निखिल जी मैं समझ नहीं पा रहा हूँ की आप आन्दोलन के माध्यम से क्या प्राप्त कर लेने की उम्मीद करते हैं.क्या जनता भ्रष्टाचार से अनभिज्ञ है जो उसे जगाने की आवश्यकता है.क्या वर्तमन नेताओं से आन्दोलन के माध्यम से इमानदार होने की कल्पना करना व्यावहारिक है.मेरठ में पिछले तीस वर्षों से हाई कोर्ट की बेंच की स्थापना के लिए हो रहे आन्दोलन के चलते ,क्या आज तक किसी राजनेता के कानों पर जूं रेंगी .

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 28, 2012

    सर आपको आज़ादी से लेकर अभी तक हुए सभी आंदोलनों के विषय में अनुभव है यह मै मानता हु .. और आप इस आन्दोलन की तुलना मेरठ के आन्दोलन से नहीं कर सकते .. जन भागेदारी के हिसाब से जे. पी. के आन्दोलन के बाद यह सबसे बड़ा आन्दोलन बन्ने की तरफ अग्रसर था….जिस तरह से आन्दोलन हुए उस तरह से दृश्य जो सामने आया वह न तो कला धन का था , न लोकपाल का ही रह गया .. न अन्ना.. न रामदेव न कांग्रेस की ही लडाई रही थी बल्कि देश में जहा जहा तक अन्ना और रामदेव का नाम पंहुचा आम जनता ने उन्हें अपने लिए एक तारनहार समझ लिया और उन्हें जितनी ताकत दी उतनी ही अपेक्षा की … मै इसी ताकत को बढ़ने की बात कर रहा था ..आप देश में सालो से हो रहे स्थानीय धरनों से इसकी तुलना नहीं कर सकते… इसमें जनता सीधे सहभागी बनना चाहती थी ..इस अपेक्षा से जिम्मेदारिय जितनी बढ़ जाती है ..खतरे और भटकाव की स्थिति भी बनती जाती है .. कुछ ऐसा ही है जनता एक और नया राजनितिक दल नहीं चाहती जो फिर से करोणपतियों के द्वारा चुनाव लड़े बल्कि वो पूरी व्यवस्था में परिवर्तन चाहती है जिसकी उम्मीद अन्ना और अरविन्द ने जगाई थी .. तो ऐसे में जबकि जनजागरण को शक्ति के रूप में बदलने का महत्वपूर्ण काम जो अधुरा था उसे पीछे धकेल कर अधूरी ताकत के साथ राजनीतिक दल बनाकर की जा रही ये लडाई सारे किये कराये पर पानी न फेर दे…. रही बात आन्दोलन से उम्मीद की तो अगर हम किसी को नेता मानकर उसके उद्देश्य और तरीके से प्रभावित होकर अगर सड़को पर सारे काम काज छोड़ कर सडको पर उतर रहे है तो उम्मीद भी तो उसी हिसाब से करेंगे और ऐसे में अगर वह नेता अपने पथ को मोड़ देता है तो विरोध तो होगा ही ..

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय वंदना जी यही बात मै कहना चाहता हु की केजरीवाल जी ने जनमत बनाया ही नहीं वे सतही आवेग को जनमत मान बैठे और घर में बैठ कर एस एम् एस करने वालो को अपना समर्थक मान लिया ..वे ये भूल गए की 10 करोण एस एम् एस करने वालो के लिए मोबाईल से एक की जगह २० मेसेज ..भेजना आसन है पर इन्हें सड़क पर उतार का एक आन्दोलन बना देना मुश्किल है .. जिसे हम आन्दोलन कह रहे है वह केवल एक विरोध था ..आन्दोलन तो अभी बनाना था ये बात अन्ना समझते थे तभी उन्होंने ये कहा की मोबाइल के एस एम् एस को वे जनसमर्थन नहीं मानते .. आप जी विकल्प की बात कर रही है तो ऐसे विकल्पों के लिए केजरीवाल जी से बड़ी लडाईया गाँधी ,जे.पी. लोहिया ..ने लड़ी .. और एक से बढ़कर एक विकल्प दिए वो भी तब जब आन्दोलनों को व्यापक बनाने के लिए मिडिया भी ऐसी सशक्त नहीं थी ..समाजवादी राष्ट्र की स्थापना का विकल्प और ..अंतिम व्यक्ति की सत्ता का विकल्प .. और हुआ क्या वो तो आज हम देख रहे है .. कारण ये है की रजनीतिक सत्ता का विकल्प दूसरी राजनितिक सत्ता नहीं हो सकती ..बल्कि शशक्त जनमत होता है …और जनमत बना नहीं था इसलिए जे. पी सभी चेले आज के सबसे बड़े सामंत बनकर राजयोग का भोग कर रहे है… वंदना जी कामन मैन केजरीवाल जी के साथ न था न है …क्योकि कॉमन मैन न लोकपाल समझता है न राष्ट्रमंडल न २ जी ..हा मीडिया के शोर में उसने अपने जैसे एक कॉमन मैंने कि झलक अन्ना में देखी जिसके लिए वो आगे आया … इसी को केजरीवाल जी ने समर्थन मान लिया ..अभी तो आन्दोलन खड़ा करना था इसपर और चर्चा और मंथन की आवश्यकता है .. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
October 26, 2012

बहुत सारगर्भित समीक्षा की है पूरे आन्दोलन की..सभी की..बधाई

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    डा. साहब अभिवादन स्वीकार करे .. लेख की सराहना के लिए बहुत बहुत आभार …अभी इसमें काफी बाते रह गई शायद इसीलिए लेख का अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका है …तभी सभी लोग इसके भाव से सहमत नहीं है ..वैसे तो आम सहमती संभव नहीं है ..पर पिछले दिनों किये गए अध्यन और अनुभवों से ही मै इस नतीजे पर पंहुचा हु की आन्दोलन और एना को अभी अधिक प्रयोग में लाना चाहिए था .. डा. साहब आपकी प्रतिक्रिया मिली बहुत प्रसन्नता हुई धन्यवाद

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
October 26, 2012

निखिल जी,सर्व प्रथम बेस्ट ब्लोगेर ऑफ़ द वीक की बधाई स्वीकार करें मैं आपके इस विचार का समर्थन नहीं कर सकता की अरविन्द केजरीवाल ने गलत राह पकड़ ली है.जिस प्रकार से सरकार ने अन्ना के आन्दोलन को उपेक्षित कर दिया था .कोई भी पार्टी उनके जनलोक्पल पास करने के लिए संकल्प बद्ध नहीं दिखाई दे रही थी.सब कुछ ऐसे लगने लगा था जी भैंस के आगे बीन बजायी जा रही है .नेताओं को कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. अतः एक ही विकल्प रह गया था एक पार्टी बना कर इमानदार सांसदों को संसद में पहुंचा कर व्यवस्था में परिवर्तन लाने के प्रयास किये जाएँ .यह तो निश्चित है की यह मार्ग आसान भी नहीं है.परन्तु हमें निराश नहीं होना चाहिए .बल्कि अरविन्द केजरीवाल के हाथ मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    सर प्रणाम अभिवादन स्वीकार करे .. आप सभी के इस आशीर्वाद के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और क्षमा चाहता हु देर से प्रत्युत्तर देने के लिए .. हम अरविन्द केजरीवाल की समीक्षा करते समय बहुत ही जल्दबाजी कर रहे है .. ..ये विषय एक लम्बी चर्चा का है और सामने आकर कार्य करने का है .. पर कुछ बहुत महत्वपूर्ण चीज कही भटक गई सी नहीं लगती ..अगर गौर करे तो स्पष्ट हो जायेगा .. की जनमत कभी भी राजनीती के प्रति नहीं बनता .. न बना ये केवल आन्दोलन के प्रति बनता है और केजरीवाल जी ने आन्दोलन को दुसरे पायदान पर कर दिया है जो उनकी राजनीती को भी लक्ष्य से भटका देगा ….

Vandana Baranwal के द्वारा
October 26, 2012

आदरणीय निखिल पांडे जी, सर्वप्रथम सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर चुने जाने के लिए हार्दिक बधाई. मेरी राय में अरविन्द केजरीवाल ने जन जागरण को कमजोर नहीं किया है बल्कि विकल्प प्रदान कर जाग चुके और जाग रहे लोगों को एक मौका दिया है. एक तरफ कांग्रेस और करप्शन है तो दूसरी तरफ केजरीवाल और कामन मैन हैं और यह संयोग नहीं बल्कि प्रयोग है. बाकी सफलता और असफलता तो भविष्य के गर्त में छुपी हुयी है.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    आदरणीय वंदना जी यही बात मै कहना चाहता हु की केजरीवाल जी ने जनमत बनाया ही नहीं वे सतही आवेग को जनमत मान बैठे और घर में बैठ कर एस एम् एस करने वालो को अपना समर्थक मान लिया ..वे ये भूल गए की 10 करोण एस एम् एस करने वालो के लिए मोबाईल से एक की जगह २० मेसेज ..भेजना आसन है पर इन्हें सड़क पर उतार का एक आन्दोलन बना देना मुश्किल है .. जिसे हम आन्दोलन कह रहे है वह केवल एक विरोध था ..आन्दोलन तो अभी बनाना था ये बात अन्ना समझते थे तभी उन्होंने ये कहा की मोबाइल के एस एम् एस को वे जनसमर्थन नहीं मानते .. आप जी विकल्प की बात कर रही है तो ऐसे विकल्पों के लिए केजरीवाल जी से बड़ी लडाईया गाँधी ,जे.पी. लोहिया ..ने लड़ी .. और एक से बढ़कर एक विकल्प दिए वो भी तब जब आन्दोलनों को व्यापक बनाने के लिए मिडिया भी ऐसी सशक्त नहीं थी ..समाजवादी राष्ट्र की स्थापना का विकल्प और ..अंतिम व्यक्ति की सत्ता का विकल्प .. और हुआ क्या वो तो आज हम देख रहे है .. कारण ये है की रजनीतिक सत्ता का विकल्प दूसरी राजनितिक सत्ता नहीं हो सकती ..बल्कि शशक्त जनमत होता है …और जनमत बना नहीं था इसलिए जे. पी सभी चेले आज के सबसे बड़े सामंत बनकर राजयोग का भोग कर रहे है… वंदना जी कामन मैन केजरीवाल जी के साथ न था न है …क्योकि कॉमन मैन न लोकपाल समझता है न राष्ट्रमंडल न २ जी ..हा मीडिया के शोर में उसने अपने जैसे एक कॉमन मैंने कि झलक अन्ना में देखी जिसके लिए वो आगे आया … इसी को केजरीवाल जी ने समर्थन मान लिया ..अभी तो आन्दोलन खड़ा करना था इसपर और चर्चा और मंथन की आवश्यकता है .. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ………….

jlsingh के द्वारा
October 26, 2012

प्रिय निखिल जी, सर्वप्रथम “बेस्ट ब्लोगर ऑफ द वीक” के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई. आपका आलेख और चिंता वाजिब है पर हमें इतना जल्द निराश होने की जरूरत नहीं है. यह ज्योति अन्ना और अरविन्द की ही जलाई हुई है. हमें इसमें थोड़ी थोड़ी इंधन डालते रहने की जरूरत है. आपने आन्दोलन के उबाल को देखा पर यह कई कारणों से धराशायी हुआ. पर एक जागृति तो आयी है और नित नए चेहरे अँधेरे से बाहर निकल रहे हैं. ‘हार नहीं मानूंगा’ का संकल्प लेने की जरूरत है. विचारणीय विषय पर आलेख प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद!

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    सर प्रणाम .. हम एक बड़ी बात भूल रहे है .. केजरीवाल जी और ऐसे हर आंदोलनकारियो में दूर दृष्टि की कमी दिखती है समझ्वादी आन्दोलन के समय एक तरह का कैडर एक व्यापक जनसमर्थन तैयार हुआ था जिसका परिणाम उन्हें सत्ता के रूप में मिला पर ये जनचेतना व्यापक नहीं हो सकी थी इसलिए इन आन्दोलनों के नेता .. सबसे बड़े सामंत बन बैठे और उन्हें सत्ता से खदेड़ने वाला नहीं मिला …. जरुरत लोकतंत्र की मशीन की पुनर्रचना की थी न की उसका एक हिस्सा बन जाने की ….. एक आशा जगाते आन्दोलन का पराभव दुखद होगा .. आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

omdikshit के द्वारा
October 25, 2012

निखिल जी, नमस्कार. जनांदोलन के लिए जो, धैर्य चाहिए ,वह केजरीवाल में नहीं था.यह तो ठीक उसी प्रकार की बात हुई कि…….चोर-चोर कहने वाले, खुद ही चोरों के ….रस्ते चल पड़े. उनका भविष्य जो भी हो ,आप का लेख बहुत ही जोरदार रहा.डबल-बधाई.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    दीक्षित जी अभिवादन स्वीकार करे .. मै इस लेख के माध्यम से यही बताना चाहता था की एक हल्का सा उबाल आया था अन्ना और रामदेव जी के प्रयासों से .. ठीक है रामदेव के अपने निहितार्थ रहे होंगे ,, पर एक लहर बनी थी अभी लम्बा काम बाकी था इस लहर को एक आन्दोलन बनाना और उसे व्यापकता प्रदान करना .. एक वर्ष का समय बहुत अल्प होता है ..इसलिए अरविन्द जी का ये कदम हड़बड़ी भरा दीखता है….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु….

yamunapathak के द्वारा
October 25, 2012

निखिल जी बेस्ट ब्लॉगर के रूप में चयनित होने पर हार्दिक बधाई. आपके ब्लॉग में की गई विवेचना बहुत ही उत्कृष्ट है.हाँ भ्रष्टाचार पर खुल कर विरोध करने वाले क्यों,कैसे और कहाँ भटक जाते हैं वह आज भी रहस्य सा ही है.आप को एक ब्लॉग की लिंक दे रही हूँ ;है प्रतीकात्मक पर इस बात का ज़वाब उसमें छुपा है http://yamunapathak.jagranjunction.com/2012/04/05/%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A7-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A7-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80/ साभार

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 28, 2012

    यमुना जी बहुत बहुत आभार आपके लेख को मैंने पढ़ा ..आपकी लेखनी में जबरदस्त क्षमता है .. आपने वह प्रतिक्रिया देने को मन किया था इसलिए यहाँ प्रतिक्रिया दे रहा हु … आपने जिस तरह अपनी बात कही है .. वो अपने आप में पूरी व्यवस्था का स्वरुप स्पष्ट कर देता है…मैंने भी भटकाव की तरफ आकृष्ट करने का प्रयास किया है ..आपका आभार

Santlal Karun के द्वारा
October 25, 2012

आदरणीय निखिल जी, पहले तो “बेस्ट ब्लोगर ऑफ द वीक” के लिए ढेरों बधाइयाँ ! दूसरे उक्त लेख क्रमिक विचार-प्रवाह, विषय और शीर्षक से आयामित विस्तार ,तथ्य-सुसंगठन तथा सटीक चित्रों के साथ प्रस्तुत किया गया है व अत्यंत प्रभावी है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! हाँ, व्याकरणिक दृष्टि से कहीं-कहीं खटकन होती है, जहाँ सुधार की गुंजाइश है |

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    दीक्षित जी अभिवादन स्वीकार करे .. मै इस लेख के माध्यम से यही बताना चाहता था की एक हल्का सा उबाल आया था अन्ना और रामदेव जी के प्रयासों से .. ठीक है रामदेव के अपने निहितार्थ रहे होंगे ,, पर एक लहर बनी थी अभी लम्बा काम बाकी था इस लहर को एक आन्दोलन बनाना और उसे व्यापकता प्रदान करना .. एक वर्ष का समय बहुत अल्प होता है ..इसलिए अरविन्द जी का ये कदम हड़बड़ी भरा दीखता है आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु ..

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 24, 2012

निखिल जी, जो हुआ सो हुआ अब आग्रह -विग्रह को छोड़कर निग्रह की ओर उन्मुख होने का समय आ गया है | अब अन्ना जी भी मान चुके हैं , ताकत दोनों ओर से लगेगी | हमें अन्ना और केजरीवाल को अलग – अलग कर नहीं देखना है ! अभी दोनों में अछे सम्बन्ध हैं , अन्ना जी अब प्रचार के लिए भी तैया हो गए हैं | वैसे आप की चिंता बिलकुल जायज है एक सच्चे राष्ट्र भक्त की तरह ! इस अछे आलेख के लिए हार्दिक बधाई !! पुनश्च !!

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 27, 2012

    अभिवादन स्वीकार करे दोनों में अछे सम्बन्ध रहने आवश्यक है और होंगे भी पर जो मिडिया दोनों को क्रांति के दूत के रूप में दिखा रहा था वही अब उन्हें अलग अलग राह का रही बता रहा है .. इससे जो गलत सन्देश जा रहा है वह आन्दोलन के भविष्य के लिए खतरनाक है … अभी आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ ये न भूले .. अभी बस हलकी सी अंगडाई थी… मुख्या लड़ाई तो अभी बहुत लम्बी है … प्रतिक्रिया के लिए आभार


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