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कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है

Posted On: 5 Mar, 2011 Others में

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चीजो को बदलने की इच्छा बहुत लोगो में होती है पर कितने लोग है ऐसे जो इमानदारी से प्रयास करने का जोखिम लेते है . जी हा आज के समय में अपनी सभ्यता संस्कृति , रीती- रिवाज की बात करना और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाना जोखिम ही तो है… लोग कहेंगे की पागल हो गया है…. सीधे मुद्दे पर आता हु…

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लगभग 1 माह पूर्व मेरी मुलाकात मित्रवत बड़े भाई श्री कामेश्वर सिंह जी के घर एक व्यक्ति से हुई जो हाथ में केसरिया ..कुर्ता, धोती, और उसी रंग की साडी लिए हुए थे और चर्चा हो रही थी की अंग्रेजी मानसिकता का प्रतीक काला गाउन की जगह महा विद्यालय के समावर्तन (दीक्षांत) समारोह में छात्र -छात्राए ये ही पहनेंगे .. मुझसे उन्होंने विचार पूछे तो राष्ट्रवादी भावना का प्रतीक होने के कारण मैंने उनके विचार से यद्यपि सहमती दिखाई पर मेरे मन में संदेह था की छात्र और उनके माता पिता .. क्या इसे सहज स्वीकार करेंगे, इमानदारी से कहू तो मुझे थोड़ी हसी भी आई गाउन में ग्लैमरस दिखने वाले छात्र धोती और साडी में कैसे दिखेंगे.. मैंने कहा के ये तो एक अपवाद होगा… क्या ये सफल होगा?…उन्होंने कहा की “”मै अपवाद को जन्म देता हु.“”...काफी भारी भरकम बात थी …इसे कहने वाले थे महाराणाप्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डा. प्रदीप राव जी ,, उन्होंने समारोह में आने का निमंत्रण भी दिया .बात आई गई हो गई .

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27 फरवरी को जिस दिन दीक्षांत समारोह था .मुझे उस आमंत्रण का स्मरण हुआ , अनिच्छा से मै वहा चला गया, इसका एक कारन ये था की कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ,असम और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महा निदेशक और बीएसऍफ़ के पूर्व निदेशक नक्सली और आतंकवादी मामलो के जानकार और चिन्तक पद्मश्री श्रीप्रकाश सिंह जी थे..तो उन्हें सुनने की उत्सुकता में चला गया ,,

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पद्मश्री श्रीप्रकाश सिंह, सदर संसद योगी आदित्यनाथ व अन्य अतिथि,एवं संबोधित करता एक छात्र

पद्मश्री श्रीप्रकाश सिंह, सदर संसद योगी आदित्यनाथ व अन्य अतिथि,एवं संबोधित करता एक छात्र

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संकल्प लेते हुए विद्यार्थी

संकल्प लेते हुए विद्यार्थी

क्या सुन्दर दृश्य था केसरिया धोती – कुर्ता में सुन्दर, तेज और उर्जा से पूर्ण युवा ..लड़के – लडकिया अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे.. मेरे मन में चल रही सभी शंकाओं का समाधान छात्र -छात्राओं उनके अभिभावकों ने स्वयं मंच से अपने उदबोधन में कर दिया .. वे कही से भी धोती कुर्ता में असहज नहीं दिखे..आत्मानुशाशन का दृश्य पुरे प्रांगण में दिख रहा था.. कही से भी नहीं लगा की गाउन के ग्लैमर से निकलने का दुःख हो.. कुल 168 छात्र-छात्राओं को स्नातक की उपाधि दी गई .. उनमे 5 – 6 ने संबोधित भी किया


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ये दृश्य देखकर मैंने कालेज को देखने का निर्णय किया और लगभग 1 घंटे तक घूमता रहा, आप ने कम ही ऐसा देखा होगा कही वो भी अपवाद स्वरुप , हर विभाग से जुडी कक्षा में उस विभाग के प्राचीन भारतीय मनीषी के नाम का बोर्ड लगा था और तस्वीर भी.. अन्दर कमरों में श्लोक, ………. आप किसी भी कालेज में जाये.. और नचिकेता , कणाद, सुश्रुत के विषय में पूछे तो मेरा दावा है ..की आइन्स्टाइन, न्यूटन , हिप्पोक्रेटस की भीड़ में वे कही दबे हुए मिल जायेंगे .. पर मुझे बहुत हर्ष हुआ ये देख कर .. की आर्यभट्ट से लेकर सी. वी. रमण, और भगत सिंह से लेकर स्वामी विवेकानंद तक के नाम से कक्ष के नाम दिए गए है…

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उत्सुकता बढती गई और मैंने कुछ छात्रो से बात की.. उनमे कुछ पूर्व छात्र भी थे,.. कालेज की अन्य विशेषताए ही इस परिवर्तन का आधार थी… उन्हें निम्न बिन्दुओ में संक्षेप में रखता हु…. ——————————————————————————————–

——यहाँ प्री यूनिवर्सिटी परीक्षाये आयोजित होती है और इनमे अधिक अंक प्राप्तकर्ताओ को सम्मानित भी किया जाता है.. .

——प्रवेश के समय जो समिति गठित होती है उसमे वरिष्ट मेघावी छात्रो को शामिल किया जाता है,

——एक सक्रिय शिक्षक – अभिभावक संघ और पुरातन छात्र परिषद् भी है ,

——विद्यालय का आरंभ वन्देमातरम के साथ होता है ,

——सप्ताह में एक दिन छात्रों द्वारा स्वयं कक्षा अध्यापन होता है ,

——प्रधानाचार्य और शिक्षक स्वयं छात्रो के साथ मिलकर प्रांगन की सफाई करते है ,.

इसके अतिरिक्त और भी कई विशेषताए है जो इस कालेज को अन्यो से अलग करती है. विद्यालय का सञ्चालन गोरक्षनाथ पीठ द्वारा होता है

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…भारतीय संस्कृति और मूल्यों के प्रति समर्पित ये कालेज उसके प्राचार्य , उनकी टीम और छात्र एक छोटी सी पहल कर रहे है… और वे गर्व से हमारे सामने कह रहे है .. की अपनी भाषा बोलने अपनी भूषा धारण करने ,और अपने वेश में अडिग रहने में कोई शर्म नहीं बल्कि ये तो गौरव का विषय है... मैकाले का गाउन उतारकर फेक देने की हिम्मत उन्होंने कर दी … जिसे आज भी पहनने में ह शर्म नहीं करते ,और तो और न्यायालयों में जज साहब भी बड़े गर्व से उस माई लार्ड के आसन पर गुलामी के चोले को पहने हुए इठलाते है...

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इस शुरुआत पर आप क्या कहते है….. ?

अपनी बात -— स्नातक, स्नातकोत्तर, और बी.एड तक की शिक्षा में मैंने आजतक इस चोले को नहीं धारण किया जिसे मेरे मित्रो ने बड़े शौक से पहन का फोटो खिचवाकर अपने घरो में टांग दिया है …..

डा.प्रदीप कुमार राव

डा.प्रदीप कुमार राव

“”एक सुखद तथ्य ये है की आज भी इस देश में ऐसे लोग है जो अपवाद को जन्म देने का हौसला रखते है.…”"

———–वन्दे मातरम्

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74 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

suma के द्वारा
March 16, 2011

निखिल जी , अपवाद का एक सुन्दर रूप और पूरी सजगता उस रूप को साकार करने की .बड़ा ही अच्छा लगा जहाँ सर्वप्रथम ऐसे अभिभावक है जो सही मार्ग में अपने बच्चो को आगे बड़ा रहे है,दुसरे वो बच्चे जिन्होंने शिक्षा का सही अर्थ पहिचाना है.तीसरे धन्य है ऐसे गुरु जिन्होंने शिक्षा से बच्चो का भविष्य ही बदल दिया और ऐसे संस्कारी बच्चो की आधार शिला इस धन्य भारत को दी.

    sushma के द्वारा
    March 16, 2011

    निखिल जी सुमा नहीं सुषमा

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 22, 2011

    शुषमा जी बहुत बहुत आभारी हु इस समर्थन के लिए

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
March 16, 2011

इस लेख को पढ़ते हुए भी एक सुखद हर्ष हो रहा है और चित्र भी वही स्थिति को बयां कर रहे हैं, “इस अपवाद को मेरा सलाम” , निश्चय ही विद्यार्थी, शिक्षक, प्रधानाचार्य और मैनेजमेंट कमेटी भी अभिवादन और प्रशंसा के पात्र हैं. और आपका भी शुक्रिया इस खबर को अपने ब्लॉग में स्थान देने का. कतिपय अगर मिडिया ठान ले और अच्छे समाचारों का ही संकलन हो तो कमोबेश हम अपने भारत में बहुत कुछ सुधार लेंगे.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 22, 2011

    समर्थन के लिए आभार

chandra shekhar sen के द्वारा
March 15, 2011

iss tarah ke apwad prakat hote rahe tub mere jaise log bhee kuch kar sakenge, thnx

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 22, 2011

    चन्द्र शेखर जी धन्यवाद

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 8, 2011

बहुत ही अनुकरणीय घटना के बारे में जानकारी दी है आपने . मन में लगा की ऐसा हम सब क्यों नहीं कर सकते .

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 14, 2011

    क्यों नहीं दीपक जी हम सभी ये कर सकते है यदि अपनी भाषा अपने वेश और अपने देश से प्रेम है तो क्यों नहीं कर सकते..हमें करना चाहिए और हम करेंगे,,, ये भावना रखे…………. आभार

AMIT KR GUPTA के द्वारा
March 8, 2011

निखिल जी नमस्कार ,आपने बहुत ही अच्छा विषय(सभ्यता -संस्कृति का ) उठाया हैं. आज हमारी सभ्यता और संस्कृति विलुप्त होती जा रही हैं. फिर भी कुछ लोग हैं जो इसे बचा कर रख रहे हैं. मेरा तो यही मानना हैं की हम आधुनिकता की दौर में शामिल हो लेकिन अपनी सभ्यता संस्कृति को बचा कर.उस कॉलेज के छात्र -छात्राओ और प्रिंसिपल को मेरी और से हार्दिक बधाई. हमें अपनी सोच को आधुनिक रखना चाहिए न की आधुनिकता के नाम पर सभ्यता और संस्कृति को खतरे में डालना चाहिए. हा यहाँ यह बात कहना प्रांसगिक होगा की सभ्यता -संस्कृति के नाम पर कुरीतियों को बढ़ावा न दिया जाये. आपकी यह लाइन बिलकुल सटीक हैं “कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है” बढ़िया लेख .जय हिंद जय भारत नाम -अमित कुमार गुप्ता हाजीपुर वैशाली बिहार

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 14, 2011

    अमित जी aapki अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभार

Deepak Sahu के द्वारा
March 8, 2011

निखिल जी ! जय हिन्द! सलाम है मुझे ऐसे महान व्यक्तित्व को,! एक ओर जहां आधुनिकता मे हमारी संस्कृति विलुप्त होती जा रही है| वहाँ ऐसे लोग अपवादों को जन्म दे रहे है!  और हमारी महान संस्कृति को उजागर कर रहे हैं!

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 14, 2011

    दीपक जी इस महान यज्ञ में आहुति देने के लिए करोणों हाथ चाहिए.. उनमे से एक बन्ने के लिए आप बधाई के पात्र है , प्रतिक्रिया के लिए आभार

Nikhil के द्वारा
March 8, 2011

प्रिय निखिल जी, बात मानसिकता की है, हमें आजकल अपनी सभ्यता और संस्कृति पर ही विश्वास नहीं रहा. फर्क सिर्फ सोच का है. जो तसवीरें आप ने पेश की हैं, देखकर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रधानाचार्य को भी लगेगा की, काले गाउन से बेहतर है ये केसरिया कुरता और सफ़ेद धोती. बधाई.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 14, 2011

    सही कहा निखिल जी ..ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रधानाचार्य को भी लगेगा की, काले गाउन से बेहतर है ये केसरिया कुरता और सफ़ेद धोती.. ही है .. आवाज से आवाज मिलाने के लिए आभार

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
March 8, 2011

आदरणीय अग्रज अभिवादन, इस तरह के अपवादों को जन्म देने वालों को नमन, किन्तु सिर्फ नमन karane से हमारा दायित्व ख़तम नहीं हो जाता, हमें मिलकर इन अपवादों को प्रचलन में लाना होगा.. जब ये प्रचलन में आ जायेंगे तभी इन अपवाद देने वाले लोगों के साहस का समुचित सम्मान हो सकेगा | वस्तुतः: अगर निष्पक्ष होकर मनन करें, तो हम पाते हैं कि हम आज भी कहीं न कहीं उन बेड़ियों को आभूषणों की तरह संजोकर रखे हैं | जो हमारी पारम्परिकता को चुनौती देती रहतीं हैं | ब्लैक गाउन भी उन्ही चुनिन्दा बेड़ियों में से है जिसे हम आभूषणों की तरह पहनते हैं | जब तक भारतावारी अपना सम्मान करना नहीं सीख पायेंगे तब तक, विश्व के अन्य देशों से अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, और मानव मूल्यों के सम्मान की सोचना कहीं न कहीं ….. अपूर्ण और असंगत लगाने लगती है | —————————————————————————————————————- अच्छे लेख के लिए बधाई

    nikhil के द्वारा
    March 8, 2011

    प्रिय शैलेश जी नमस्कार,सही कहा आपने ….बेड़ियों को आभूषणों की तरह संजोकर rakhne की आदत बन चुकी है हमारी .. लेकिन इस प्रवृत्ति से बहार निकलना होगा .. अन्यतः ये बाजारवाद की अंधी हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगी क्योकि इसकी बन्दूक आजकी हमारी ही युवा पीढ़ी के कंधे पर है… सहयोग के लिए आभारी हु..आपने विस्तृत रूप में अपनी बात कही..

hash के द्वारा
March 7, 2011

श्री आशीष राज्वंश्जी,बहुत बढ़िया लिखा हे आपने हार्दिक बधाई!होली की शुभकामनाओं के साथ–subhash budawan wala,[M.A.,B.Sc.,]..18,shantinath corner,khachraud[mp] pin-456224.mob-9425987630.e-mail.sbudawanwala@yahoo.com

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    सुभाष जी बहुत बहुत धन्यवाद सराहना के लिए

ASHISH RAJVANSHI के द्वारा
March 7, 2011

नमस्कार निखिल भाई , यह सच है की धारा प्रवाह के साथ बहना और विपरीत प्रवाह में तैरना , दोनों ही स्थितियों में उतना ही अंतर है जितना जमीन और आसमान में | कभी कभी किसी बदलाव के लिए विपरीत परिस्थितियों को पैदा करना पड़ता है जो की आपके प्रेरणास्रोत श्री प्रदीप राव जी ने की | हमे प्रयत्नशील रहना होगा की हम भी कुछ ऐसा ही कर सके | शुभकामनाएं

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    आशीष जी बहुत सटीक पंक्ति में आपने कहा है की बदलाव के लिए विपरीत परिस्थितियों को पैदा करना पड़ता है… .. और प्रदीप राव जी से मेरी मुलाकात मात्र दो बार हुई और उस कार्यक्रम के बाद भारतीय मूल्यों क एप्रती उनकी प्रतिबद्धता को देखकर उनके प्रति सम्मान मेरे मन में बहुत बढ़ गया है.. ..सही कहा आपने हम सभी को ऐसे कार्यक्रमों में कुछ सकारात्मक करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए ..आपने समय निकल कर प्रतिक्रिया दी उसके लिए धन्यवाद

drsinwer के द्वारा
March 7, 2011

निखिल जी नमस्कार, आपने बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा हे बहुत पसंद आया ,देश भावना से ओत प्रोत आपकी रचना ने मन मोह लिया | कहने के लिए सब्द नहीं हे मेरे पास बधाई स्वीकार करे |.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    डॉ साहब आपने समय निकल कर लेख को पढ़ा और इस प्रयास को सराहा उसके लिए धन्यवाद

Rajan के द्वारा
March 7, 2011

निखिल भाई… सच कहू तो मेरी बेसिक education शिशु मंदिर से हुई है और आज भी मई मानता हु की भारतीय संस्कृति और शिक्षा में संस्कार कही बचा है तो वो शिशु मंदिरों में ही है. रही बात convocation गाउन की तो ये अपवाद वाला प्रोग्राम दूसरी university के लिए एक सन्देश होगा जो आज़ाद होने के आधी सदी बाद भी न ही मैकाले की शिक्षा वयवस्था बदल सके है और ना ही convocation का तरीका… महाराणा प्रताप पीजी कालेज में हुई शुरुआत ये अच्छा सन्देश है.. मेरी ओर से कालेज प्रबंधन और निखिल जी आपको बराबर बधाई..

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    आपका बहुत बहुत आभार .. सही कहा आपने भारतीय संस्कृति और शिक्षा में संस्कार कही बचा है तो वो शिशु मंदिरों में ही है. मै आज भी शिशु मंदिरों में जाता हु और वह का अनुशाशन देखता हु तो मन में एक तसल्ली होती है की शिक्षा पूरी तरह से गिरवी नहीं रखी गई है . महाराणा प्रताप का कालेज प्रबंधन तो निश्चित रूप से इस मौलिक सुधर का अग्रदूत बना है और हम सभी चाहते है की विश्वविद्यालयो तक ये सन्देश पहुचे अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभार .. मै प्रयास करूँगा की डा. प्रदीप राव जी इन बहुमूल्य समर्थन को जरुर देखे जो इस मंच से उनके प्रयासों को मिली है सभी का आभार

R K KHURANA के द्वारा
March 7, 2011

प्रिय निखिल जी, राष्ट्रिय भावना से ओत प्रोत आपकी रचना ने मन मोह लिया ! सच में भीतर तक बहुत ही अच्छा लगा ! परन्तु जैसे की आपने आशंका जताई है लोग इसका मजाक ज्यादा उड़ाते है ! परन्तु कोइ लगन का पक्का अगर किसी काम को अंजाम देना चाहे तो उसे किसी की परवाह नहीं होती ! बौसे सुंदर ! राम कृष्ण खुराना

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    सर प्रणाम आपकी आशीर्वाद स्वरुप प्रतिक्रिया मिली उसके लिए बहुत बहुत आभारी हु…

Er. D.K. Shrivastava Astrologer के द्वारा
March 7, 2011

समर्थ और इच्छा शक्ति के धनी कुछ भी कर सकते है | उनका संकल्प ही कार्य में बदल जाता है | बस, चिझे भीतर से आनी चाहिए |

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    सहयोग के लिए आभार आपने समय निकल कर इस लेख को पढ़ा और प्रतिक्रिया दी..

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 7, 2011

श्री निखिल जी, बस एक बात कहूँगा…. “Nothing is impossible in this world.” भगवान प्रदीप राव जी को और ताकत दे…… आकाश तिवारी

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    आकाश जी बहुत बहुत धन्यवाद मै चाहूँगा की प्रदीप राव जी इसे जरुर पढ़े और देखे की इस सफ़र में वे अकेले नहीं है

sunildubey के द्वारा
March 7, 2011

ये एक सकारात्मक सोच से भरी शुरुआत है .. ये काफिला बन जाये .. और हम सभी इससे जुड़े .. प्रदीप राव जी एक विशिष्ट कार्य कर रहे है .. उन्हें हम सभी को समर्थन देना चाहिए.. राष्ट्रीय अस्मिता और मानदंडो को प्रतिस्थापित करने वाले हर कार्य की सराहना की जानी चाहिए..

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    सुनील जी आभार

vinita shukla के द्वारा
March 7, 2011

एक शुभ शुरुआत. हमारे भारतीय शिक्षा केन्द्रों में, उपाधि ग्रहण करने के लिए, विदेशी चोले को धारण करने का क्या औचित्य? राष्ट्रीय अस्मिता को बनाए रखने के लिए, हमारी, एक अलग पहचान तो होनी ही चाहिए.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    विनीता जी सही कहा आपने हमें अपनी पहचान को सामने लाने के लिए जबरदस्ती थोपे गए मानदंडो को जमींदोज कर आगे बढ़ना होगा.. प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

kmmishra के द्वारा
March 6, 2011

“”एक सुखद तथ्य ये है की आज भी इस देश में ऐसे लोग है जो अपवाद को जन्म देने का हौसला रखते है.…”” – यही लोग सच्चे अर्थों में भारत को नयी दिशा दे सकते हैं । इस लेख से कुछ और लोगों को अपवाद रचने की प्रेरणा मिलेगी । आभार ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    भ्राता श्री प्रणाम… आपसे कुछ विशेष प्रोत्साहन की आशा थी.. .. वास्तव में अगर एक भी व्यक्ति इस लेख से कुछ ऐसा करने को प्रेरित हो तो ये सफल है… वैसे ऐसी सज्जन शक्तियों को प्रोत्साहन देने के लिए समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना चहिये .. आभार

surendrashuklabhramr के द्वारा
March 6, 2011

जिसे मेरे मित्रो ने बड़े शौक से पहन का फोटो खिचवाकर अपने घरो में टांग दिया है ….. प्रिय निखिल पाण्डेय जी ..सुन्दर संकलन ..व्यंग्य ..मेहनत का कार्य ..चित्रों से प्रदर्शन सहित भरे लेख के लिए बधाई हो ..हाँ ऐसे लोग हैं जो अपवाद को जन्म देने और …आज के समय में अपनी सभ्यता संस्कृति , रीती- रिवाज की बात करना और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाते जोखिम लेते हैं लोग पागल हो गया है कहें या सनकी क्या फर्क पड़ता है ..पर काश वे इस छोले को उतर कर टांग न देते ….. shuklaabhramr5

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    इस विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आभार

div81 के द्वारा
March 6, 2011

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर………………. एक अच्छी शुरुवात भर है | अभी तो एक तरंग उठी है सुनामी आनी बाकी है फिर भारत की तस्वीर ही कुछ और होगी | बहुत सही कहा आप ने “”एक सुखद तथ्य ये है की आज भी इस देश में ऐसे लोग है जो अपवाद को जन्म देने का हौसला रखते है.…””

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    जी दिव्या जी हमें देखना चाहिए और दिखाना चाहिए भारत की वास्तविक तस्वीर सभी को… आपको लेख पसंद आया सराहना के लिए आभार

priyasingh के द्वारा
March 6, 2011

बहुत अच्छी पहल की इस कालेज ने ………. मै भी इस समारोह की चर्चा अपने आस-पास जरुर करुँगी …. जिससे हो सकता है की सारे कालेज इस तरह के ही दीक्षांत समारोह करने की सोचे …………आभार आपका जो आपने हम सबको इस समारोह की झलकिया दिखाई ………….वैसे ये कालेज किस शहर में है …….

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    बिलकुल प्रिय जी आप इस की चर्चा करे और अधिक जानना चाहे तो मै डॉ राव का का कान्टेक्ट नंबर उपलब्ध करूँगा … ऐसे योजनाओ और कर्यकरामो के लिए हम सभी को मिलकर समर्थन करना चाहिए ..

Pooja के द्वारा
March 6, 2011

बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसे समारोह की झलकियाँ दिखा हमें भी इसमें शामिल करने के लिए… अच्छा लगा की आज भी कुछ लोग हिम्मत रखते हैं लीग से अलग करने के लिए… और इन्हें देखकर लगता है की ये हिन्दुस्तानी दीक्षांत समारोह है…

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    पूजा जी इस अमूल्य समर्थन के लिए आभार

March 6, 2011

प्रिय निखिल जी अभिवादन, जैसे की आपने कहा था, वैसे ही मै भी कभी ब्लॉग प्रमोट नहीं करता. पर इस तरह के लेख और विचार तो मैं कहता हूँ कि आप न केवल प्रमोट कीजिये बल्कि हक़ से लोगों के मुंह पर दे मारिये. मैं तो खुद ही इस तरह के विचारों और संस्कृति का प्रबल समर्थक रहा हूँ और आप यदि मेरे पिछले लेखों पर जायेंगे तो देखेंगे कि मैंने हमेशा सरस्वती शिशु मंदिरों की शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी स्कूलों की शिक्षा पद्धति से ज्यादा बेहतर माना है. मेरी तो समझ में नहीं आता कि इस तरह की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं होती. अभी पिछले वर्ष की ही बात है जब पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने एक दीक्षांत समारोह में अपना कन्वोकेशन गाउन अचानक उतार दिया था और इसे अंगरेजी बर्बरता का प्रतीक बताया था. हालांकि वो उनकी दिखावे की नौटंकी थी. पर ईमानदारी से इसकी पहल होनी ही चाहिए तभी हम अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा कर पायेंगे. डा. प्रदीप राव जी को मेरी ‘हैट्स ऑफ’ और आपको भी इस ब्लॉग के लिए बधाई.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    अभिवादन स्वीकार करे .. इस उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार … मैंने स्वयं डा. प्रदीप राव जी से कहा की इस कालेज के किसी भी कार्यक्रम में मुझे जरुर बताये.. वास्तव में वहा बहुत सुखद अनुभूति हुई

Alka Gupta के द्वारा
March 6, 2011

भारतीयता के रंग में रंगी सुन्दर चित्रमय प्रस्तुति पर बधाई ! बहुत अच्छा लगा पढ़कर

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    अलका जी आभार सराहना के लिए

chaatak के द्वारा
March 6, 2011

निखिल जी, जिस परिवर्तन को आपने देखा उसकी तस्वीरें मात्र ही रोमांचित कर रही हैं| मुझे पूरा यकीन है कि हिंदुस्तान अभी भी कुछ दिलों में साँसे ले रहा है| जय हो!

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    चातक जी आभार प्रतिक्रिया के लिए

nishamittal के द्वारा
March 6, 2011

यदि इच्छा शक्ति हो तो हम अपने सद्विचारों को स्वप्नों को साकार कर सकते हैं.सराहनीय प्रयास साथ ही अनुकरण के योग्य सचित्र विवरण प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी..

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    निशा जी पोस्ट अच्छी लगी इसके लिए आभार

rahulpriyadarshi के द्वारा
March 5, 2011

सबसे पहले एक उन्नत और उद्देश्यपरक लेख के लिए बधाई स्वीकार करें,पढ़कर बहुत ही सुखद एह्साह हुआ,इस महाविद्यालय और इसके पुरोधा श्री प्रदीप राव जी को सादर नमन करना चाहूँगा,उम्मीद है मैं जल्द ही इस पावन प्रन्गद का साक्षात् दर्शन भी करून,आपके लेख ने निश्चित रूप से मेरी उत्सुकता बाधा दी है,आपको पुनः धन्यवाद,

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 5, 2011

    कृपया प्रन्गद को प्रांगण पढ़ें.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    राहुल जी जरुर आये इस विद्यालय को देखना अपने आप में सुखद अनुभव है…

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 5, 2011

प्रिय निक्जिल जी ….नमस्कार ! अआपने बहुत ही अचरजभरी जानकारी दी है अपने इस लेख में ….. मैंने अपने कालेज के दूसरे वर्ष में एक नई पहल की थी , अपने हरे लखनवी कढ़ाई वाले कुर्ते के साथ हरे रंग की पतलून वाली ….. पहले पहल तो कुछेक छात्रों ने मज़ाक उड़ाने की कोशिश की …..लेकिन बाद में पांच छह छात्रों ने मेरी नकल करते हुए कुर्ते के साथ पतलून पहनना शुरू कर दिया ….. आपका यह लेख एक नई शुरुआत की तरफ इशारा कर रहा है …. नए और पुराने के अनोखे संगम का …. बधाई

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद प्रभु

sanjay kumar tiwari के द्वारा
March 5, 2011

Nikhil ji Aapne tasveero ke madhyam se asli hindustan ke darsan kara diye …..en pitambari vastro ko dekh kar man main ek sukhad shanti ka anubhav hone laga hai …punh ek sarthak lekh ham tak pahuchane ke liye dhanyavad

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    संजय जी प्रतिक्रिया के लिए आभार

charchit chittransh के द्वारा
March 5, 2011

निखिल जी , जय हिंद ! भारतीय और भारतीयता पर लिखा गया कोई भी लेख मैं छोड़ना नहीं चाहता किन्तु आपकी लेखनी में और विषय चयन में आप अनुपम हैं ! भारतीयता के सफल जागरण का प्रतिनिधित्व करने पर बधाई !

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद चित्रांश जी

rajeev dubey के द्वारा
March 5, 2011

निखिल जी, प्रस्तुति अच्छी लगी… कई लोग अभी भी भूकंप महसूस कर रहे होंगे गोरखपुर में…

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    राजीव जी धन्यवाद

Ramesh bajpai के द्वारा
March 5, 2011

प्रिय पाण्डेय जी बहुत अच्छा लगा यह भारतीय रंग यह भारतीय जज्बात | बहुत बहुत बधाई |

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद सर

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 5, 2011

निखिल जी, ऐसे ही अपवादों की आज देश को सख्त ज़रूरत है|  साधुवाद,

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    वाहिद भी सही कहा आज ऐसे लोगो की बहुत आवस्यकता है

आर.एन. शाही के द्वारा
March 5, 2011

सार्थक और अहम प्रसंग सहित आपकी सांस्कृतिक चर्चा सराहनीय है निखिल जी । बधाई ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    उत्साहवर्धन के लिए आभार

NIKHIL PANDEY के द्वारा
March 5, 2011

एक मजेदार तथ्य की जानकारी अभी अभी हुई … जिसे आपसे बाटना जरुरी है.. जब कालेज में धोती कुर्ते की बात हुई तो तो सभी विद्यार्थियों ने इसे स्वीकार नहीं किया था …..कुछ ने ही इसे सहमती जताई तो डा. प्रदीप राव जी ने इस विचार को त्यागने की जगह आगे बढ़ने का निर्णय कर लिया ..और लगभग 50 -60 ने इसे पहना .. जब कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी तो धोती कुरता जैसे पारंपरिक वेश में अपने सहपाठियों को देखकर अन्य छात्रो का मन भी हो गया उसे पहनने का और सभी छात्र- छात्राए ..इसके लिए तैयार हो गए.. और ऐसा हुआ की धोती कुर्ता ही कम पड़ गया और कुछ छात्रो ने कार्यक्रम के बाद धोती कुर्ता पहनकर अपनी फोटो खिचवाई ……….

    suman के द्वारा
    March 6, 2011

    nice

    nikhil pandey के द्वारा
    March 6, 2011

    सुमन जी धन्यवाद

    mohitse29 के द्वारा
    March 14, 2011

    आप की यह चर्चा अत्यंत ही सराहनीय है.


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