सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

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दिखावे का भी दोष है ....

Posted On: 3 Mar, 2011 Others में

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पिछले कुछ दिन बहुत व्यस्तता भरे रहे.. लगन का समय है और जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा विवाह में व्यस्त है ..उसे न बजट की चिंता है न पेट्रोल और गैस के दाम की ….. अब आप कहेंगे की खुद तो विवाह कर लिया बाकी लोगो के विवाह से क्यों तकलीफ होने लगी.. तो साहब .. नाराज न हो कोई तकलीफ नहीं है.हमें .. …..

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हमारे एक मित्र है उनकी बहन का तिलक चढाने जाना था .. वे न्योता देने आये और बोले की अपनी कार भी ले लेना ..मै पेट्रोल भरवा दूंगा .. अब आना जाना लेकर दुरी 300 किलोमीटर थी तो आप समझ सकते है की लगभग 1500 का पेट्रोल लग जाता ..जब उन्होंने खुद भरवाने की बात कही तो क्या दिक्कत होती … तो सही दिनपर हम लोग पहुच गए … वहा पहुच कर मै सोच में पड गया कुल 10 -11 लग्जरी कारे पहले से खड़ी थी , और अधिक ताज्जुब तब हुआ जब ये देखा की हर गाडी में तीन या चार लोग मात्र थे , वैसे तो लोग बेटी – बहन की शादी में हेलीकाप्टर देने लगे है .. मेरा क्या जाता है इसमें .. पर मै सोच में इसलिए पड गया था क्योकि मित्र की आर्थिक स्थिति इतनी बेहतर नहीं थी ..और ये सारा काम मात्र 4 -5 गाडियों में हो सकता था…इसमें धन और पेट्रोल की भी बचत होती... पर उफ़ ये हमारी देखने – दिखाने की आदत ..आज भी हम कर्ज लेकर हैसियत को दिखाने में लगे हुए है..

wedding-car

मुझे पूरा विश्वाश है की ऐसे दृश्यों से दो- चार आपको भी होना पड़ा होगा.. .. मुझे याद है 1991-92 में जब पेट्रोल संकट हुआ था तब टेलीविजन पर बार -बार ये बताया जाता था की वाहनों के इस्तेमाल में किफ़ायत बरते पेट्रोल बचाए ..पर हम कितने बेवक़ूफ़ है.. पेट्रोल -डीजल हमारे घर की खेती नहीं है .. आसमान छूती पेट्रोल डीजल की कीमते आज हमारे सारे घरेलु खर्चो को अस्त-व्यस्त कर रही है तब भी हम ऐसे दिखावो में इंधन को पानी की तरह बहा देते है तो दोषी तो हम ही ज्यादा है …और जब कीमते बढती है तो हम सरकार विरोधी झंडा उठाकर निकल पड़ते है सड़को पर.

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सुबह टहलने के वक्त मैंने एक नियम बना लिया था की सड़क पर जलने वाले सभी बल्ब जो मुझे दीखते थे उन्हें बंद कर देता था… लेकिन सरकारी कार्यालयों में और कालोनियों में दिन भर 100 वाट के जलने वाले बल्ब ऐसी व्यक्तिगत कोशिशो को किस तरह हतोत्साहित करते है आप अंदाजा लगा सकते है, हम अपने स्तर से छोटे प्रयास नहीं करना चाहते .. और पानी बिजली , इंधन सबके लिए सरकार के नाम का रोना रोते है… लिंडसे लोहान को गाँधी जी की बात समझ में आ गई की परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करनी चाहिए ... पता नहीं हमें कितना वक्त लगेगा ?

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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संदीप कौशिक के द्वारा
May 21, 2011

निखिल जी, एक विचारणीय पोस्ट….आपका आभार !! लेकिन आपके शब्दों से सहमति जताते हुए यही कहना चाहूँगा कि हक़ीक़त वास्तव में बहुत हतोत्साहित करने वाली है | :( http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 7, 2011

श्री निखिल जी, बिलकुल सही बात कही आपने मैंने अपने एक लेख में इस विषय में बहुत विस्तृत चर्चा की थी….जिसे आज पुनः पोस्ट करना था..अब आपका पोस्ट देखा है तो लगता है की जल्दी से पोस्ट कर दूं.. आकाश तिवारी

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    आकाश जी जरुर पोस्ट करे मै इंतजार कर रहा हु

K M Mishra के द्वारा
March 6, 2011

निखिल जी नमस्कार । हमारे नीतिग्रंथों में लिखा है कि अगर धर्म का मर्म न समझ सको तो जिस राह पर देश और समाज के बड़े लोग चले हैं उसका ही अनुसरण करो । सबसे आसान रास्ता । लेकिन आज समाज और देश के बड़े लोग भ्रष्टाचार, धन के दुरूपयोग और वैभव का प्रदर्शन करके दूसरे लोगों को गलत संदेश देते हैं और गलत परंपरा की नींव पड़ती है । जागृत करने वाले लेख के लिये आभारी हूं । कभी कभी हम जानते तो सब है लेकिन वक्त पर भूल जाते हैं । तब ऐसे लेख हमारी यादों और ज्ञान को ताजा करते हैं।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    क्या बात कही है आपने.. ,, गलत कार्यो का आचरण हमेशा ऊपर से छनकर ही नीचे आता है .. और यही कारन है की ऊपर के दिखावे से प्रभावित होकर हम अपना नुक्सान कर लेते है …प्रतिक्रिया के लिए आभार

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 5, 2011

निखिल जी, बात तो सच है कि यदि बदलाव देखने का सपना है तो खुद को भी बदलना होगा| वक़्त तो अब सन्निकट ही दृश्य हो रहा है मुझे| साभार,

    nikhil pandey के द्वारा
    March 6, 2011

    जी वाहिद जी …. शुरुआत हमें खुद ही करनी होगी.. प्रतिक्रिया के लिए आभार

aftab azmat के द्वारा
March 5, 2011

निखिल जी, सादर प्रणाम…आपने हमारे बदलते और बेकार होते समाज पर अच्चा कटाक्ष किया है…महंगाई के तडके के साथ…बहुत खूब… http://www.aftabazmat.jagranjunction.com/

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    सराहना के लिए धन्यवाद आफ़ताब जी

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 4, 2011

प्रिय निखिल जी …नमस्कार ! यार ! एक लेख “आखरी समय” के बाद भोग पर की जाने वाली गैर जरूरी रस्मों और खर्च पर भी लिख मारो धन्यवाद

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    राजकमल जी अभिवादन…. जरुर लिखेंगे.. उस विषय पर भी… आपका सहयोग ऐसे ही बना रहेगा तो हर विषय पर लिखेंगे धन्यवाद

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
March 4, 2011

आदरणीय निखिल जी सादर अभिवादन ! दिखावा समाज में फ़ैली एक संक्रामक बिमारी है, और ये दिखावा आयोजन विशेष में ही न होकर जीवन के हर पल में लोगों के साथ साथ चलता हैं, उदाहरण के लिए लोग दिनक जीवन में प्रयोग की जाने वाली वस्तुएं, और सेवायें उपभोग में लाते हैं, जिनके साथ किसी अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी या किसी चर्चित व्यक्तित्व का नाम जुदा होता है | जबकि दूसरे उत्पादों जिनके उपभोग से पर्याप्त बचत की जा सकती है, जिनमे गुणात्मकता तो है, किन्तु विज्ञापन की मदों से कटौती के कारण सस्ते हैं | और आयोजनों के समय तो इनका क्या पूछना दिखावे के लिए पैसे और अन्य ( संसाधन ) बहा दिए जाते हैं ….. बढ़िया लेख बधाई

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    शैलेश जी क्या किया जाये ये दिखावा कही का नहीं छोड़ता फिर भी लोग नहीं समझते

allrounder के द्वारा
March 4, 2011

नमस्कार निखिल भाई सच कहा आजकल दिखावे के लिए व्यक्ति कुछ भी करने को तैयार रहता है ! सामाजिक प्रतिस्था के नाम पर खर्च की चिंता करना आजकल किसी को अच्छा नहीं लगता !

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद सचिन जी बहुमूल्य प्रतिक्रिया देने के लिए

sanjay kumar tiwari के द्वारा
March 4, 2011

Nikhil ji hindustan bhrastachar aur dikhave se mukt ho jaye to bahut sari samsyayoo se nijat mil jaye ……sunder aur gyanvardhak lekh …….

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    March 4, 2011

    तिवारी जी , आपके लिए मैंने बहुत पहले चुराया हुआ एक लेख दुबारा पोस्ट किया था …..उस पर अमल करके लाभ उठाये …..धन्यवाद

आर.एन. शाही के द्वारा
March 4, 2011

सचमुच सब दिखावे के कीड़े का ही दोष है निखिल जी । बधाई ।

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद सर

Nikhil के द्वारा
March 4, 2011

निखिल जी, आपकी यह रचना नवचेतना की तरफ इशारा करती है. अचेतन मन को जगाने के लिए आभार. निखिल झा

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    निखिल जी धन्यवाद

March 4, 2011

निखिल जी अगर हमें अपने देश और मानवता के हित में काम करना है तो ऐसी छोटी-२ लेकिन महत्त्वपूर्ण बातों पर हमें ध्यान देना ही पड़ेगा. जल, पेट्रोलियम, उर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग अगर बंद नहीं हुआ तो ये मानव को बर्बादी की और ले जाएगा. इस विषय पर सभी को गंभीरता से विचार करना चाहिए और स्वयं से शुरुआत करनी चाहिए. धन्यवाद.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    संसाधनों के दुरुपयोग क एलिए हम भी काफी हद तक जिम्मेदार है

vinita shukla के द्वारा
March 4, 2011

सच कहा आपने. शुरुआत खुद से ही करनी चाहिए. यही सोच, अगर सब अपना लें तो देश के हालात ही बदल जाएँ.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    जी विनीता जी स्वयं से शुरुआत की जाये तो काफी कुछ बदल सकता है

Dharmesh Tiwari के द्वारा
March 4, 2011

भाई निखिल जी,बिलकुल शायद दिखावे की वजह से ही अनेको दिक्कतों का जन्म होता है, धन्यवाद!

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    आभार

rachna varma के द्वारा
March 4, 2011

निखिल जी , एक कहावत है “ऋण ले कर घी पीना ” जिसे पहले के लोग गलत समझते थे दूसरी कहावत है “उते पांव पसारिये ,जितनी लम्बी सौर ” अर्थात पहले के लोग हर हाल में खुश रहना जानते थे | अब समय बदल चुका है जितना शो -ऑफ किया जा सकता है लोग कर रहें है इस लिए दिखावा भी बढ रहा है परेशानियाँ भी बढ रही है |

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    जी रचना जी दिखावा ही तो कई समस्याओ की जड़ है

charchit chittransh के द्वारा
March 4, 2011

निखिल जी , जय हिंद ! आपको पढ़कर कितना अपनापन और गौरव का अनुभव हो रहा है शब्दों में व्यक्त करना कठिन है . आपके विचार अनुकरणीय हैं ! साधुवाद स्वीकारें !

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
March 4, 2011

निखिल जी आपने मेरे विचारों को शब्द दिए,सच में ये सब देखकर बहुत कष्ट होता है.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    निशा जी इस सराहना के लिए आभार

Harish Bhatt के द्वारा
March 3, 2011

निखिल जी सादर प्रणाम, बहुत ही अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई. हमको पैर उतना ही पसारना चाहिए जीतनी चादर हो. पर ये दिखावा पता कहा ले जायेगा इन नासमझ लोगो को.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    हरीश जी प्रणाम .. प्रोत्साहन के लिए आभारी हु

chaatak के द्वारा
March 3, 2011

निखिल जी, आपने बिलकुल सही कहा अब हमें समझ लेना चाहिए कि खर्चीली शादियाँ और त्यौहार हमें और ज्यादा दरिद्र बनाते हैं | जगाने वाली पोस्ट पर बधाई!

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    जी चातक जी समय धन और संसाधनों का अपव्यय करने वाले कई आयोजनों से समस्याए खड़ी हो जाती है

दीपक पाण्डेय के द्वारा
March 3, 2011

निखिल जी, मैं भी इसका अनुपालन करता हु की परिवर्तन की शुरुआत खुद से करनी चाहिए. पर कुछ दृश्य देख कर मन खट्टा हो जाता है. दिखावे का सबसे बड़ा उदाहरण अभी टीवी पर देख रहा था. सुन्दर आलेख,बधाई.

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    दीपक जी धन्यवाद

rameshbajpai के द्वारा
March 3, 2011

प्रिय निखिल जी दिखावे का हाल तो बहुत बुरा है | लोग मात्र अन्य की होड़ में बिना अपनी परिस्तिथि का ध्यान दिए वहसब कर डालते है जिसके कारण बाद में बहुत सी समस्याए उत्पन्न हो जाती है |

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    March 7, 2011

    सर प्रणाम ऐसा ही कुछ है.. नक़ल करने में ही सफलता मानने की बीमारी कभी कभी समस्या खड़ी कर देती है


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