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तू ही मन मीत है-“Valentine Contest”

Posted On: 14 Feb, 2011 Others में

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मित्रो चलते चलते वो कविता सुनना चाहता हु (यदि आप सभी बोर न हुए हो तो ).. जो पहली बार मैंने अपनी पत्नी के लिए लिखी थी..[असल में पड़ोस में उनकी बहन किरायेदार थी जहा वो आई हुई थी ...तो विवाह की बाते अन्दर अन्दर हो रही थी मुझे पता नहीं था इसलिए मैंने देखने की कोशिश भी नहीं की .. और जब विवाह तय हो गया और देखने की इच्छा हुई तो उन्होंने घर से बाहर ही निकलना बंद कर दिया और फिर अपने घर चली गई .... उसी समय में ये कविता मैंने लिखी थी..]…..ये रचना छंद में है………….

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सुन के दो बैन ,मन चैन पाए ,रैन सारी कट जाये नैन भर निहारते – निहारते.

प्रीत की ये रीत ,मन मीत देख ,गीत नए बन जाये तुझको पुकारते – पुकारते .

कितने पहर बीते ,शशि – दिनकर बीते ,हाट -बाट -घर बीते सोचते – विचारते,

ओरी सुकुवारी -प्यारी ,सुनी है अटारी- आरी, क्षण भर केश ही संवारते – संवारते

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पथ-पथ नए रंग ,पग-पग तुम संग,पल-पल है उमंग बस यही प्रीत है.

तीर सी पवन लगे ,शीत से तपन जगे,सावन में लगे जैसे बूंद बूंद गीत है.

रात दिन काट लिए, सुख दुःख बाँट लिए, क्षण भर सोच नहीं हार है की जीत है,

तन-मन भाया मुझे प्रेम से सजाया,तुझे देख रोम रोम रोम कहे तू ही मन मीत है

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आप समझ गए होंगे इतनाप्रेम क्यों उमड़ रहा है पत्नी पर ..असल में वो मायके से आ चुकी है..और आज ही पिछली सारी पोस्ट पढने वाली है …. आगे कहने की जरुरत नहीं

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
February 17, 2011

बहुत ही सुन्दर कविता ………. मन छू लेने वाली कविता सुन के दो बैन ,मन चैन पाए ,रैन सारी कट जाये नैन भर निहारते – निहारते. प्रीत की ये रीत ,मन मीत देख ,गीत नए बन जाये तुझको पुकारते – पुकारते . कितने पहर बीते ,शशि – दिनकर बीते ,हाट -बाट -घर बीते सोचते – विचारते, ओरी सुकुवारी -प्यारी ,सुनी है अटारी- आरी, क्षण भर केश ही संवारते – संवारते कुल मिलाकर अद्भुत रचना है

    nikhil के द्वारा
    March 2, 2011

    शैलेश जी धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 16, 2011

खूबसूरत कविता……..

    nikhil के द्वारा
    March 7, 2011

    धन्यवाद पियूष जी

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 16, 2011

निखिल जी…. सुंदर रचना…. अब भाभी जी आ गयीं हैं… बच के रहिएगा…. आपने उन से पूछ कर लिखी हैं यह रचना या…… एक नज़र इधर भी डालियेगा http://himanshudsp.jagranjunction.com/2011/02/16/an-appeal/

    nikhil के द्वारा
    February 26, 2011

    धन्यवाद

priyasingh के द्वारा
February 16, 2011

इस कविता को पढ़कर आपकी पत्नी का ही नहीं बल्कि जिस जिस ने इसे पढ़ा होगा उस उस का मन खुश हो गया होगा ……… अत्यंत मधुर कविता ……

    nikhil के द्वारा
    February 26, 2011

    प्रिया जी धन्यवाद आपको कविता पसंद आई

sanjeev sharma के द्वारा
February 15, 2011

निखिल जी, “तीर सी पवन लगे ,शीत से तपन जगे,सावन में लगे जैसे बूंद बूंद गीत है. रात दिन काट लिए, सुख दुःख बाँट लिए, क्षण भर सोच नहीं हार है की जीत है” इन पंकितियों के द्वारा आपने अपने दिल का नहीं बल्कि दुनिया के सारे प्रेमियों के दिल का हाल बयाँ कर दिया.इस सुन्दर कविता के लिए बधाई

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    संजीव जी बहुत बहुत आभार आपने समय निकल कर पढ़ा और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया दी

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 15, 2011

श्री निखिल जी, सुंदर प्रस्तुती….भाभी जी को अब घर बुला ही लीजिये… आकश तिवारी

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    आकाश जी धन्यवाद

Dharmesh Tiwari के द्वारा
February 15, 2011

निखिल जी नमस्कार,यानि कुलमिलाकर भाभी जी को एक जबरदस्त तोहफा एक सुन्दर से गीत के रूप में,वाह क्या बात है,धन्यवाद!

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    सराहना के लिए धन्यवाद

rajkamal के द्वारा
February 14, 2011

priy nikhil bhaai …nmskaar ! पारिक जी ने शायद ठीक ही फरमाया है …. हमारे पंजाब में भी एक कहावत है की रंडी रोवे यारा नू नाल ले के फिरे भरावा नू बीएस अब तो आप रब्ब से यही दुआ कीजियेगा की आपकी पत्नी मेरी टिप्पणी न पड़ ले …. आगे आपकी किस्मत

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    राजकमल जी डरने की जरुरत नहीं है.. मुझे भी और आपको भी

Amit Dehati के द्वारा
February 14, 2011

वाह क्या बात है ……बहुत सुन्दर रचना ! बधाई स्वीकारें ! http://amitdehati.jagranjunction.com/2011/02/09/%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%B8-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%86-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE/

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    अमित जी सराहना के लिए आभार

omprakash pareek के द्वारा
February 14, 2011

वाह जनाब, कहीं ऐसा तो नहीं कि कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना खैर छोडिये . आपके इन छंदों का शब्द विन्यास और लयात्मकता (rhythm ) इतनी सुन्दर है जो आधुनिक कविताओं में दुर्लभ हो गयी है . मुझे इन छंदों को देख कर महाकवि निरालाजी कि वो पंक्तियाँ याद आ गयी कि “नव गति नव लय ताल छंद नव नवल कंठ नव जल्द मन्द्र नव नव नभ के नव विहग वृन्द को नव पर नव स्वर दे वर दे …….

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    पारीक जी कही निशाना नहीं है सर .. बस कविता के माध्यम से मनोरंजन करना ही है… आपकी ये प्रतिक्रिया अनमोल और उत्साह बढ़ने वाली है.. धन्यवाद

Deepak Sahu के द्वारा
February 14, 2011

निखिल जी! अत्यंत ही सुंदर कविता! बधाई

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    dipak ji dhanyawaad

deepak pandey के द्वारा
February 14, 2011

सुन्दर कविता , निखिल जी. बहुत ही आसानी से जुबान पर चढ़ गई.

    nikhil के द्वारा
    February 15, 2011

    दीपक जी धन्यवाद


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