सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

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अपना मै ही हूँ...................

Posted On: 4 Dec, 2010 में

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मै………………………………………….

खुद बरसता हूँ ,…

खुद को ही समोता भी हूँ .

मै अपना आसमा हूँ ,….

दरिया भी अपना मै ही हूँ .

images …………………………….

खुद अपनी मंजिल हूँ ,

रहगुज़र अपना……..

राही भी अपना मै ही हूँ ,

तलाशमें अपनी हूँ …….. ……..

………………… जरिया भी अपना मै ही हूँ ..

…………………………………………………………………………………………………………

मुस्कराहट अपनी हूँ ….

अपना ही सूनापन भी हूँ .,,,,

अपनी सदियाँ हूँ . ………………………….

……लम्हा भी अपना मै ही हूँ…………

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lahar के द्वारा
September 17, 2011

अच्छी रचना के लिए आपको बहुत – बहुत बधाई |

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 26, 2011

आपकी इस रचना ने मुग्ध कर दिया बधाई, आप काव्य लेखन भी बहुत अच्छा करते हैं आभार

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 6, 2010

निखिल जी, बहुत ही उत्कृष्ट रचना..बहुत सुन्दर लिखा है आपने…. बधाई स्वीकार करें.. मै ? कहीं किसी की हसी तो नहीं, आँखों से निकला गम तो नहीं, “मै” जान न सका अपने को, कहीं ये अकेला तो नहीं.. http://aakashtiwaary.jagranjunction.com आकाश तिवारी

    nikhil pandey के द्वारा
    December 6, 2010

    क्या बात है आकाश जी शानदार प्रतिक्रिया के लिए आभार

rajkamal के द्वारा
December 4, 2010

यह तो किसी सिद्द पुरुष की पूरी आत्मकथा को + एहसासों को + अध्यात्मिक संसार को चंद शब्दों में बया किया है आपने ….

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    राजकमल जी ….. जो भी है अपना ही है ..और मै कोई सिद्ध पुरुष नहीं बल्कि सामान्य पुरुष ही हु

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    प्रतिक्रिया के इए आभार

Wahid के द्वारा
December 4, 2010

खूबसूरत अल्फाज़, आप एक आलातरीन फ़नकार हैं|

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    वाहिद जी आपका बहुत बहुत आभारी हु इस उत्साहवर्धन के लिए

nishamittal के द्वारा
December 4, 2010

एक अच्छी कविता के लिए बधाई .

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    धन्यवाद निशा जी

abodhbaalak के द्वारा
December 4, 2010

मुस्कराहट अपनी हूँ …. अपना ही सूनापन भी हूँ .,,,, अपनी सदियाँ हूँ . …………………………. ……लम्हा भी अपना मै ही हूँ………… बहुत ही सुन्दर कविता, दिल के तारों को छु जाने वाली ऐसे ही लिखते रहें निखिल जी http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    अबोध जी आभार इस प्रतिक्रिया के लिए

आर.एन. शाही के द्वारा
December 4, 2010

आदमी की खुद्दारी के महत्व को स्थापित करतीं आपकी ये चन्द लाइनें काफ़ी कुछ कहती हैं निखिल जी । बधाई ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    आदरणीय शाही जी प्रणाम … उत्साहवर्धन के लिए आभारी हु

December 4, 2010

तलाशमें अपनी हूँ …….. …….. ………………… जरिया भी अपना मै ही हूँ बहुत अच्छी कविता है निखिल जी.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    राजेंद्र जी आभार प्रकट करता हु इस सराहना के लिए

roshni के द्वारा
December 4, 2010

निखिल जी बहुत बढ़िया लिखा अपने ….. धन्यवाद सहित

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    रौशनी जी बहुत बहुत धन्यवाद इस सराहना के लिए

Alka Gupta के द्वारा
December 4, 2010

मुस्कराहट अपनी हूँ……..लम्हा भी अपना मैं ही हूँ……….बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ ज़रिया भी अपना मैं ही हूं ……..काफी  कुछ कह दिया है आपने बहुत ही अच्छी रचना है , निखिल जी  

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    अलका जी आपने भाव को समझा ..और प्रतिक्रिया दी इसके लिए आभारी हु

बहुत अच्छे निखिल भाई !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    राशिद भाई धन्यवाद

R K KHURANA के द्वारा
December 4, 2010

प्रिय निखिल जी, अपने हाथ जगन नाथ ! सब कुछ मैं ही हूँ अच्छी कविता खुराना

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    आदरणीय खुराना जी आभार

allrounder के द्वारा
December 4, 2010

निखिल जी विचारों की इस उत्तम अभिव्यक्ति के लिए बधाई !

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    सचिन जी इस सराहना के लिए आभारी हु ..

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 4, 2010

भाई पाण्डेय जी नमस्ते,चंद लाईनों में बहुत कुछ बया कर दिया आपने,धन्यवाद!

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    December 5, 2010

    धर्मेश जी धन्यवाद …


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