सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

राष्ट्रवादी,राजनीतिक,सामाजिक चर्चा,विचार मंथन

55 Posts

1032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 150 postid : 283

आँचल वो लहराया दिखा

Posted On: 5 Oct, 2010 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

गजल

****************************

वो न था ,शायद मुझे,                images2

उसका वही साया दिखा.

बाम पर कल शब् मुझे ,

आँचल वो लहराया दिखा,


***************************************************

images

वक़्त भी वो ही हुआ था,

मिलने का जो तय था किया,

वो भी वादे के मुताबिक ,

वक़्त पर आया दिखा .

*****************************************************

images1

चाँद मद्धम हो चला था,

उस शफक को देख कर,

उसके हुस्न-ए-ताम से ,

वो खुद पे शरमाया दिखा,

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

45 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Wahid के द्वारा
December 4, 2010

बेहतरीन उर्दू अदब का मुजाहिरा किया है आपने निखिल जी| आपका एहतराम|

atharvavedamanoj के द्वारा
November 4, 2010

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||…………………………….मनोज कुमार सिंह ”मयंक” प्रिय मित्र निखिल पाण्डेय जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

    nikhil के द्वारा
    November 6, 2010

    मनोज जी दीपोत्सव पर आपके इस ओजमय आवाहन से सभी जागृत होंगे ऐसी मेरी मनोकामना है… दीपोत्सव आप और आपके पुरे परिवार के लिए शुभ हो वन्दे मातरम

Arvind Pareek के द्वारा
November 1, 2010

प्रिय श्री निखिल पांडेय जी, लाजबाव तरीके से श्रृंगारिक गजल । पिछली पोस्‍ट में अकबर के माध्‍यम से जबर्दस्‍त व्‍यंग्‍य । लगता है आपनें पकड़ लिया है लिखनें का ढ़ंग । बस इसी तरह लि‍खते रहिए । अरविन्‍द पारीक http://bhaijikahin.jagranjunction.com

    nikhil के द्वारा
    November 6, 2010

    भाई जी को प्रणाम और इस उत्साहवर्धन के लिए आभार….

October 30, 2010

वक़्त भी वो ही हुआ था, मिलने का जो तय था किया, वो भी वादे के मुताबिक , वक़्त पर आया दिखा . खूबसूरत पंक्तियों के लिए बधाई……….. निखिल जी…………

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 30, 2010

    पियूष जी धन्यवाद …आपको गजल पसंद आई

Manish Singh "गमेदिल" के द्वारा
October 30, 2010

खूबसूरत कलाम http://manishgumedil.jagranjunction.com

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 30, 2010

    मनीष जी आभार सराहना के लिए

kirti के द्वारा
October 19, 2010

निखिल जी चाँद मद्धम हो चला था,उस शफक को देख कर,उसके हुस्न-ए-ताम से ,वो खुद पे शरमाया दिखा,……………बहुत खूब ….बधाई

    nikhil के द्वारा
    October 21, 2010

    कीर्ति जी ..गजल आपको पसंद आई … मेरा उत्साहवर्धन हुआ.. अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार

ashvini kumar के द्वारा
October 16, 2010

यार कहाँ हो वक्त का दो चार कतरा मंच पर भी दे दो ,,तुम्हारी कमी खल रही है (चिट्ठी न कोई संदेश ) कुछ नया ले कर आओ ……..तुम्हारा

    nikhil के द्वारा
    October 18, 2010

    दोस्त थोडा व्यस्त और परेशान हु.. ..मामा जी हमारे एडमिट है 5 दिन से इसलिए मंच पर समय नहीं दे प् रहा हु..हॉस्पिटल की दौड़ ज्यादा हो रही है… जल्द ही मिलेंगे..

deepak joshi के द्वारा
October 14, 2010

प्रिय निखिल जी, बहुत ही सुन्‍दर चित्रमय प्रस्‍तुती है – वक़्त भी वो ही हुआ था, मिलने का जो तय था किया, वो भी वादे के मुताबिक , वक़्त पर आया दिखा . धन्‍यवाद -दीपकजोशी63

    nikhil के द्वारा
    October 18, 2010

    सर प्रणाम , बहुत बहुत आभार ..आपने प्रतिक्रिया के लिए समय निकाला और रचना को सराहा

rajkamal के द्वारा
October 9, 2010

निखिल भाई …बहुत सुंदर कविता … नीचे भी एक टिपण्णी आप की किरपा दृष्टि का इंतज़ार कर रही है

    nikhil के द्वारा
    October 10, 2010

    राजकमल जी धन्यवाद सराहना के लिए..

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
October 6, 2010

आदरणीय निखिल जी प्रणाम | वाह – क्या ग़ज़ल लिखी है आपने, पढ़ के दिल खुश हो गया …… इस मंच पर आपकी पहली ग़ज़ल लाज़व्वाब लगी ……. बधाई

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    शैलेश जी बहुत बहुत आभार आपका एक कवि से अपनी प्रशंशा सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई…

abodhbaalak के द्वारा
October 6, 2010

” शफक पर चाँद अपने हुस्न पर इतरा रहा था जब, तुम्हे देखा तो शर्मा कर सरे बादल वो जा छुपा” पाण्डेय जी यही कह सकते हैं, ग़ज़ल में भी आप ने महारत हासिल कर ली है अब तो शायर लोगो को भी सोचना पड़ेगा की क्या लिखें अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    सराहना के लिए आभार ……….. पर आप ने प्रशंशा कुछ ज्यादा ही कर दी ..इस मंच पर तो मै अभी अबोध हु… यहाँ तो कई दिग्गज पड़े है… फिर भी उत्साहवर्धन के लिए … धन्यवाद्

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 6, 2010

बहूत खूब पांडे जी …… न चाहते इश्क तो ये गम न होता, जवानी का ये रंग मेरा बेरंग न होता.. आपकी गजल बहुत अच्छी है….. आकाश तिवारी

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    आकाश जी सराहना के लिए आभार ………….

rita singh 'sarjana' के द्वारा
October 6, 2010

निखिल जी , वाह ……क्या खुबसूरत गजल ! बधाई l

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    रीता जी उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

syeds के द्वारा
October 6, 2010

वो न था ,शायद मुझे, उसका वही साया दिखा. सुंदर कविता

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    धन्यवाद syeds जी सराहना के लिए

daniel के द्वारा
October 6, 2010

आपकी ग़ज़ल तो खूबसूरत है ही ! तस्वीरों और रंगों ने इसमें चार चाँद लगा दिए !! ***शुभकामनायें***

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    बहुत बहुत धन्यवाद इस तारीफ़ के लिए

R K KHURANA के द्वारा
October 6, 2010

प्रिय निखिल जी, बहुत अच्छी कविता है ! खुराना

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    सर प्रणाम ,, आशीर्वाद के लिए आभारी हु….

roshni के द्वारा
October 6, 2010

पाण्डेय जी क्या कहने हर लफ्ज़ खुबसूरत और हसीं अंदाज ……… आभार सहित

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    रौशनी जी बहुत बहुत आभार आपको…. इस उत्साहवर्धन के लिए

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 6, 2010

नमस्कार निखिल जी………….उसके हुस्न-ए-ताम से , वो खुद पे शरमाया दिखा…………….इन लाईनों ने मन मोह लिया,बधाई

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    धर्मेश जी बहुत बहुत धन्यवाद

K M Mishra के द्वारा
October 6, 2010

इधर कुछ दिनों से जागरण जंक्शन पर खूब पटाखे छूट रहे थे । आपकी कविता ने माहौल बदल दिया । आभार ।

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    प्रणाम ,,भ्राता श्री ……. यही सोच कर तो मैंने यह गजल पोस्ट की … कुछ मीठा हो जाये आपको पसंद आई .. धन्यवाद

ashvini kumar के द्वारा
October 6, 2010

निखिल जी (उसके हुस्न -ए-ताम)शब्द मोतियों से लगते हैं (आपका तस्सव्वुर तारीफे बेमानी है ) बस यही कहना है ,वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह,…..सुभानअल्लाह

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    अश्विनी भाई आपने तो तारीफों के कई सेतु बना दिए .. पता नहीं मै इतना योग्य हु की नहीं.. मगर इस शानदार अंदाज में आपने सराहना की है उसके लिए आभार

ashvini kumar के द्वारा
October 6, 2010

(उसके हुस्ने ताम पर) ,आपके अल्फाज मोतियों की तरह हैं ,[ मैने पहले भी लिखा था आप अति संवेदनशील हृदय हैं ,जो आपकी रचनाओं में परिलक्छित होती है ,,]

    nikhil के द्वारा
    October 10, 2010

    धन्यवाद

Ramesh bajpai के द्वारा
October 6, 2010

निखिल जी क्या बात है बहुत खूब सूरत बधाई

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    सर प्रणाम ………. आशीर्वाद के लिए बहुत बहुत आभारी हु…

आर.एन. शाही के द्वारा
October 6, 2010

निखिल जी तस्वीरों ने आपकी पिछली दहेज़ वाली कविता याद दिला दी . बधाई .

    nikhil के द्वारा
    October 6, 2010

    सर प्रणाम ………….. गजल को सराहने के लिए आभार … इस आशीर्वाद से ही उत्साह वर्धन होता है


topic of the week



latest from jagran