सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

राष्ट्रवादी,राजनीतिक,सामाजिक चर्चा,विचार मंथन

55 Posts

1032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 150 postid : 149

हिंदी की कहानी हिंदी की जुबानी -3

Posted On: 17 Apr, 2010 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मेरा विरोध करने वाले कई तर्क देते है ..मै उनकी बातो का जवाब एक एक करके दूंगी……….

क्षेत्रीय विषमता की दुहाई .……… जो लोग क्षेत्रीय विषमता की दुहाई

देकर मेरा विरोध करते है उनसे ये कहना चाहती हु की वे इतिहास को देखे इसी क्षेत्रीय विषमता में मुझे व्यापक समृधि और विस्तार मिला है . भक्तिकाल से लेकर स्वतंत्रता आन्दोलन तक देश के हर भाग में विद्वानों ने हिंदी में प्रचार प्रसार किया . महा पंडित राहुल संकृत्यायन ने स्वयंभू रचित रामायण कथा जो की पउमचरित के नाम से प्रसिद्ध है ,को हिंदी भाषा का प्रथम ग्रन्थ माना है,स्वयंभू दक्षिण भारत के थे यही नहीं महाराष्ट्र के नामदेव, संत तुकाराम,ज्ञानेश्वर,गुजरात के -स्वामी दयानंद ,नरसी मेहता, बंगाल के- चैतन्य ,असाम के- शंकर देव जैसे महान संतो विचारको ने अपनी बात को हिंदी में ही जन जन तक पहुचाया..गाँधी, तिलक ,टैगोर, लाला लाजपत राय ,सुभाष चन्द्र बोस ,मदनमोहन मालवीय,ऐसे लाखो स्वतंत्रता के सेनानी जिन्होंने हिंदी को भारत की पहचान के रूप में मान्यता दी. क्या वे किसी एक ही क्षेत्र के थे ?? फिर क्षेत्रीय विषमता का रोना रोकर मेरे कदमो में बेडी क्यों डाली जाती है क्या भारत के अलग अलग क्षेत्रो के लोग अब अपने क्षेत्र के उन सेनानियों का सम्मान नहीं करते?

सांप्रदायिक होने का आक्षेप -—- मुझपे सांप्रदायिक होने का लांछन

लगाने वालो के लिए हिंदी के प्रथम गज़लकार उस्ताद आमिर खुसरो की ही कही बात रखती हु…. “”मै हिंदी का हु , हिंद मेरा प्यारा वतन है ,वतन के तई प्यार ही मेरा ईमान है, मै एक ईमानदार वतनपरस्त रहकर हिंद की ही मिटटी में मिल जाना चाहता हु. “” खुसरो पुनः कहते है …”"मै हिंद का तोता हु , मुझसे मीठा बोलना चाहो तो हिंदी में बात करो“” मुझपर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाने वालो का कठोर प्रतिवाद करते हुए राजर्षि पुरुषोत्तम दस टंडन ने कहा “”" यदि खुसरो ,जायसी ,हजरत निजामुद्दीन ,अब्दुल रहमान ,रहीम,और रसखान,की भाषा होते हुए भी कोई हिंदी को सांप्रदायिक सिद्ध कर दे तो मै साहित्य सम्मलेन भवन को आग लगा दूंगा “”‘ क्या मै स्वयं पर साम्प्रदायिकता का आरोप स्वीकार कर सकती हु ?

पिछड़ापन -—— कुछ ज्ञानी मुझपर पिछड़ी भाषा होने का भी आरोप

लगते है,वास्तव में ये उनकी अल्पज्ञता और भाषा के प्रति कम समझ का नतीजा है … वास्तविकता तो यह है की मेरी रचनात्मकता और वैज्ञानिक प्रकृति ही मेरी मुख्य विशेषता है. मै जर्मन भाषा की तरह अपने प्रत्ययो से नए शब्दों का निर्माण कर लेती हु ..और ये विशेषता उनकी अंग्रेजी में नहीं है . अनेक देशी -विदेशी शब्दों को अपने में समाहित कर मैंने अपने शब्द भण्डार और अभिव्यक्ति को निरंतर समृद्ध किया है . यही नहीं मैंने सरल ,गत्यात्मक,तथा व्यवहारिक देवनागरी लिपि को अपनाया है और आप सब जानते है की हिंदी जिस रूप में बोली जाती है उसी रूप में लिखी भी जाती है इसलिए अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी सीखना ज्यादा सरल है ..सर्वनामो की एकरूपता,सरलता, विभक्तियो का प्रयोग,विशेषणों का आसान स्वरुप,कुछ ऐसी विशेषताए है मुझमे जो देश की किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा मुझे सरल और व्यापक बनाती है ..वास्तव में मेरी ये सारी विशेषताए मुझे सरल और प्रगतिशील बनाती है.मगर मेरे विरुद्ध तरह तरह की भ्रान्तिया फैली है.

नोट्स ओन इंडियन अफेअर्स में फ्रेडरिक जोनशोर ने लिखा है -”एक शिक्षित व्यक्ति जिसे हिन्दुस्तानी भाषा का साधारण ज्ञान हो नागरी लिपि लिख सकता है

आधुनिक तकनीकी से तालमेल बनाने में असमर्थ —-यद्यपि ये

सही है की इन क्षेत्रो में हिंदी का प्रयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ है पर क्या इसके लिए मै जिम्मेदार हु? अगर आप ने ये मान लिया है की बिना अंग्रेजी के आप विकास नहीं कर पाएंगे तो दोषी तो आप्सब्की मानसिकता है . क्या कभी आपने सोचा… की रूस ,फ्रांस, चीन,जापान,जर्मनी,जैसे देश जिनका हम अनुकरण करते है ..उन्होंने अपने ज्ञान विज्ञानं ,प्रौद्योगिकी के विकास के लिए क्या अंग्रेजी का ही सहारा लिया है ….?? जब आपकी मानसिकता ही अंग्रेजी को हिंदी पर वरीयता देने का आग्रह नहीं छोड़ पा रही है तो दोष मुझपर क्यों..? ये सही है की अंग्रेजी विश्व में संपर्क भाषा है पर क्या इसका मतलब ये है की विश्व में संपर्क बढ़ने के लिए हम अपनी जड़े काट डाले.?उपरोक्त सभी राष्ट्रों ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, ठोस बुनियादी ढाचा खड़ा किया ,तकनीकी ,प्रोद्योगिकी,साहित्य सबके लिए विशेषज्ञों को अपनी भाषा में काम करने के लिए प्रोत्साहन दिया .और विश्व में अपनी भाषा को सम्मान दिलाया इन्होने बाजार को अपनी तरफ खीचा न की बाजार का अनुकरण किया .,, एक उदाहरण देखिये.. कुछ वर्ष पहले की बात है माइक्रोसोफ्ट कंपनी ने 3 वर्ष में भारत में 7 करोड़ $ निवेश योजना की घोषणा की..जबकि उतने ही समय में उसने चीन में 75 करोड़ $ निवेश की घोषणा की…. क्या चीन में भारत से ज्यादा और अच्छी अंग्रेजी बोलने वाले है? नहीं … स्पष्ट है की बाजार संख्या बल को देखता है…और अगर हम बाजार के पीछे न भागे तो हमारा संख्याबल इना पर्याप्त है की हम बाजार को अपनी शर्तो पर चलने को मजबूर कर सकते है …सरकार सोचती है जनता को हिंदी के प्रति जागरूक कैसे करे ? हम जानते है की जो भाषा राजकाज की भाषा होती है जनता उसका ही अनुकरण करती है उसे ही शिक्षा का माध्यम बनाना पसंद करती है . व्यवहारिक रूप से आज भी ये स्थिति अंग्रेजी को प्राप्त है . ये विडम्बना ही है की जिस महान राष्ट्र ने अपनी इतंत मौलिक सभ्यता और संस्कृति से विश्व को सम्मोहित कर विश्वगुरु की प्रतिष्ठा अर्जित की उसी देश की आज की पीढ़ी अपने ज्ञान,विज्ञानं, साहित्य,के विकास के लिए उधार की भाषा का सहारा ले रही है कुछ उत्साही हिद्नी प्रेमियों का प्रयास है की हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए इससे जरुर उसकी दशा में सुधर होगा….यद्यपि ये प्रयास वैसे ही है की जड़ सूख रही हो और पानी पत्तियों पर छिड़का जाए...पर चलिए ये प्रयास भी सही….अपनी वैश्विक स्थिति और भविष्य की योजनाओं पर बात अगले अंक में करूंगी आप सब भी मेरी व्यथा सुनकर परेशान हो रहे होंगे किन्तु परेशान न हो….अभी मेरे कदम रुके नहीं है ……… यात्रा अभी जारी है …….

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.25 out of 5)
Loading ... Loading ...

9 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
April 22, 2010

भारत को आज़ाद हुए इतने वर्ष बीत गए किन्तु हम लोग अभी भी अंगरेजी की गुलामी को छोड़ नहीं पा रहे हैं ! इसीलिए हिंदी को पिछड़ी भाषा कहा जाता है ! किसका दोष है ! हमारा या सरकार का ? खुराना

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    April 22, 2010

    आपकी बात एकदम सही है सरकार से ज्यादा दोषी तो हम ही लोग है ……..हमारी मानसिकता अंग्रेजी की गुलामी के आकर्षण से अभी निकल नहीं पाई है .. पर इसके लिए सरकार भी कम दोषी नहीं है .क्योकि जिन बातो को आधार बनाकर जिनके सहारे आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी वे सारी बाते सारे आधार सरकारों ने भुला दिए.. जैसा की भगत सिंह को दर था की कही ये आजादी कुछ मुट्ठीभर नेतावो और पूंजीपतियों की ही आजादी न बन कर रह जाए …. वही हाल है किसान मजदूर , स्वदेशी, हिंदी जिस जिस चीज को लड़ाई में हथियार बनाया गया था वे सारी चीजे भुला दी गई .. हिंदी पर भी लम्बी चौड़ी राजनीति ही चलती रही है अबतक और हुआ कुछ भी नहीं ..

NIKHIL PANDEY के द्वारा
April 20, 2010

जैक .मनोज जी ,सुभाष जी आपके उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद …..ये हाथ ऐसे ही मिलते रहना जरुरी है … और परिवर्तन तो एक दिन में होता है ,… हिंदी को भी उसकी जगह मिलेगी … हिंदी से जुडी कोई भी तथ्य मिले तो जरुर दे …….

subhash के द्वारा
April 19, 2010

kisi bhi bhasha ko badhne ke liye rajnitik sakti ki jarurat hoti hai afsos bharat main drid ichcha sakti ka hamesa abhav raha hai

    nikhil pandey के द्वारा
    March 28, 2011

    thanks

manoj के द्वारा
April 19, 2010

हिंदी हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा है , एक भारतीय होने के नाते हम सदा इसका सम्मान करते है चाहे समाज इसे पिछडी भाषा कहे या जो कहे. और ऐसा बिलकुल नही है कि हिंदी आधुनिक तकनीकी से तालमेल बनाने में असमर्थ है आज भी कई टेकनिकल किताबों और इंटरनेट साइटे हिंदी में हैं.

    nikhil pandey के द्वारा
    March 28, 2011

    मनोज जी धन्यवाद

jack के द्वारा
April 19, 2010

निखिल जी जो लोग हिंदी को पिछडी भाषा बतलाते है वह लोग खुद पिछडे होते है अपने देश में रहक्र जो अपनी भाषा को पिछडी कहे उससे बडा पिछडा कोई नही हो सकता है. आप ने जिस तरह हिंदी की कहानी को लिखा है उससे लोगों मॆं इसके प्रति और भावना जागी है. लिखते रहिए.

    nikhil pandey के द्वारा
    March 28, 2011

    धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran