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हिंदी की कहानी हिंदी की जुबानी -2

Posted On: 12 Apr, 2010 में

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मेरे जीवन की कठिनाइयो का अंदाजा मुझे तभी हो गया था जब संविधान सभा में मुझे भारत की राजभाषा बनाये जाने का विरोध करते हुए भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा .–

“” संविधान और कानून भले ही हम हिंदी के पक्ष में बना ले लेकिन व्यवहार में अंग्रेजी बनी रहेगी “”...

तभी ये तय हो गया की मेरी राह में सबसे बड़ी रुकावट हमारी मानसिकता और पूर्वाग्रह है . बहरहाल मुझे राजभाषा का दर्जा मिला और संविधान के अनुच्छेद 343 (१) में भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी को मान्यता दी गई .पर सरकार ने ये तर्क दिया की मुझे पूरी तरह स्वीकार करने में भारत को कठिनाई है और ये कहके अनुच्छेद 343 (२) में कहा गया की संविधान क्रियाशील होने के 15 वर्षो तक के लिए अंग्रेजी का ही प्रयोग होगा . एक तरफ हिंदी विरोधी स्वर और दूसरी तरफ सरकार का अंग्रेजी के प्रति मोह , मेरे लिए स्थितिया बहुत प्रतिकूल थी..तभी 343 (३) में कहा गया की 15 वर्षो बाद भी अंग्रेजी के प्रयोग को प्राधिकृत करने का अधिकार संसद को होगा और इस तरह आधे अधूरे प्रयासों और बाधाओं के साथ मैंने आजाद भारत में कदम रखा .

1955 में बाल गंगा खरे की अध्यक्षता में पहले राजभाषा आयोग का गठन हुआ उसका प्रतिवेदन 1956 में आया .इसमें कहा गया ..

(अ). माध्यमिक शिक्षा तक हिंदी की अनिवार्यता ,

(ब). विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी की पढाई की व्यवस्था .

(स).प्रशासनिक कार्यो के लिए हिंदी ज्ञान की अनिवार्यता .

(द).केंद्रीय सेवा से सम्बंधित प्रतियोगी परीक्षाओ में अनिवार्य रूप से हिंदी का समावेश …….. इत्यादि प्रावधानों की संस्तुति की जिनके आधार पर 1960 में उच्चतम न्यायलय की भाषा, केंद्र सरकार के स्थानीय कार्यालयों के आतंरिक कार्यो की भाषा हिंदी होने सहित कुछ महत्वपूर्ण बाते कही गई. 1963 में बने राजभाषा अधिनियम में तय किया गया की कुछ कार्य हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ में किये जाये.फिर राजभाषा अधिनियम 1964 में ये कहा गया की सभी राजकीय कार्यो में अंग्रेजी का प्रयोग 26 january 1971 तक होता रहेगा . कठिनाइयो में ही सही ही सही मगर मै चलती रही ..२६ जनवरी 1965 को सैद्धांतिक रूप से मै राजभाषा बन गई . पर इसके बाद ही मुझपर राजनीती की काली छाया पड़ी ,.1965 के बाद तमिलनाडु से विरोध आन्दोलन शुरू हो गया मुझे राजभाषा बनाये जाने के विरुद्ध .और देखते ही देखते हिन्दुस्थान में में तूफान सा खड़ा हो गया . आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु, बंगाल, कर्णाटक, केरल, में भारी हिंसा हुई और सैकड़ो लोग मारे गए..भारतवासी राष्ट्र भाषा का विरोध कर रहे थे और भारत की स्वतंत्रता अपने दुर्भाग्य पर विलाप कर रही थी . मै तो मान अपमान की सीमा से परे थी मगर ये उन लाखो आत्माओं की भावना का अपमान था जिन्होंने विभिन्न प्रान्तों से होते हुए भी मुझे राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने और राष्ट्र की स्वतंत्रता को गरिमामय बनाने का स्वप्न देखा था .

त्रिभाषा फ़ॉर्मूला—– अंततः इसी दुर्भाग्य का बहाना बनाकर 1967 में ये प्राविधान किया गया की केंद्र सरकार और अहिन्दी भाषी राज्यों के मध्य पत्र व्यवहार में तबतक अंग्रेजी का प्रयोग होगा जबतक अहिन्दी भाषी राज्य हिंदी में पत्र व्यवहार करने का निर्णय स्वयं न कर ले.इस तरह त्रिभाषा फ़ॉर्मूला लागु किया गया. 1976 में राजभाषा से जुड़े कुछ नियम बनाये गए .इसमें राज्यों को तीन वर्गों में बाटा गया .—-

क वर्ग – उत्तर प्रदेश,बिहार,मध्य प्रदेश,राजेस्थान,हरियाणा,हिमांचल प्रदेश,दिल्ली ..

ख वर्ग –पंजाब ,महाराष्ट्र ,गुजरात,चंडीगढ़ ,व अंदमान निकोबार समूह,

ग वर्ग –इसमें शेष राज्यों को रखा गया .

‘क ‘ वर्ग के राज्यों में राजकीय सेवाओ में भरती में हिंदी को वैकल्पिक माध्यम रखा गया , प्रशिक्षण केन्द्रों में हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई , हिंदी में लिखे गए पत्रों का जवाब हिंदी में देना अनिवार्य किया गया . और ये लक्ष्य रखा गया की जहा हिंदी प्रचलित है वहा हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये , और जहा एकदम प्रचलन नहीं है वहा इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाये, हिंदी के विकास के लिए विभिन्न मंत्रालयों में समितिया गठित की गई . पर परिणाम वाही ढाक के तीन पात . न ही सरकार ने गंभीर प्रयास किये और न ही मुझे पूर्ण प्रतिष्ठा मिली.

मेरे शुभचिंतको में भी निराशा आई. और वे मेरे भाग्य पर विलाप करते थे… कैसे अपने शैशव काल से ही मुझे मुश्किलें उठानी पड़ी ..पहले विदेशी भाषाओ से टकराना पड़ा और अब अपने ही घर की राजनीती से...कुछ उत्साही समर्थको ने मुझे अंतर्राष्ट्रीय मंच पे जगह दिलाने और वैश्विक भाषा बनाने का स्वप्न तक देख लिया .जब मुझे संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यकारी भाषाओ में स्थान दिलाने की बात सोची… पर मेरे मन में ये व्यथा है की पहले मुझे अपने घर में तो सम्मान और प्रतिष्ठा मिले. अपने घर में उपेक्षित और राजनितिक कलह का शिकार हु मै इससे बाहर क्या सन्देश जायेगा ?

मेरे विरोध के कारन और उनका मूल्याङ्कन -————–

विभिन्न प्रान्तों के भिन्न भाषाई लोगो का स्वभाषा प्रेम और उसका विकास करने के प्रयास उचित और स्वाभाविक है .पर अंग्रेजी का समर्थन और मेरा विरोध तो तर्कहीन और अनुचित ही है . मेरा विरोध करने वाले हमेशा क्षेत्रीयता ,साम्प्रदायिकता ,पिछड़ेपन व अन्य तर्कों को आधार बनाते है .किन्तु उनका ये मूल्याङ्कन तर्कहीन है ..

अपने ऊपर लगाये गए सभी आरोपों का जवाब मै अपनी कहानी की अगली कड़ी में दूंगी ………अभी यात्रा जारी है ……

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kmmishra के द्वारा
April 22, 2010

हिन्दी की व्यथा उसी की जुबानी सुनाने का बहुत ही सुंदर प्रयास किया है आपने । हिन्दी के साथ अब तक चाहे जो घटा हो लेकिन हम देखते हैं कि दैनिक जागरण आज दुनिया का सबसे बड़ा अखबार है और यह हिन्दी में छपता है । दूसरी बात की हिन्दी का प्रचार प्रसार हम सब ब्लागर भी बड़ी तनमयता और ऊर्जा के साथ कर रहे हैं । और वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी इंटर नेट पर इस्तेमाल होने वाली सबसे बड़ी भाषा बन जायेगी ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    April 22, 2010

    मिश्र जी आपकी बात सही है . जागरण की ये पहल बहुत बेहतरीन है पर समस्या ये है की इस मंच पर जागरण परिवार के लोग ही गलत परंपरा डाल रहे है वे अंग्रेजी का मोह नहो छोड़ पा रहे है और उनके लेख अंग्रेजी में ही आ रहे है … इससे समस्या ये होगी की वे लोग जो अंग्रेजी को ही अपनी विचारशक्ति की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम मानते है वे अंग्रेजी में ही अपने विचार व्यक्त करने लगेंगे और फिर उनकी देखादेखी सभी अंग्रेजी की जानकारी का रौब झाड़ने लगेंगे .. इस बात का दर है मुझे .. क्योकि आम जनता हमेशा .. प्रसिद्ध या सफल व्यक्ति के दिखावे का अनुकरण करना चाहती है … इससे समस्या होगी

santosh के द्वारा
April 15, 2010

बहुत खूब….! ऐसे ही लिखते रहिये….!

    nikhil pandey के द्वारा
    March 28, 2011

    संतोष जी धन्यवाद

R K KHURANA के द्वारा
April 14, 2010

निखिल जी, हिंदी की इतनी बढ़िया जानकारी देने के लिए आपका आभार ! मैं समझता हूँ की हिंदी की दुर्दशा हमारे सरकारी तत्न्त्र के कारण ही हुई है ! हमारी सरकार अभी तक हिंदी को पूरे राष्ट्र में ही लागू नहीं कर पाई है तो इसके भविष्य के बारे में आप क्या कह सकते हैं. ! शिक्षा के शेत्र में ही ले लीजिये ! स्नातक होने के लिए आपको अंग्रेजी में पास होना आवश्यक ऐसे हालत में आप हिंदी का क्या भला सोच सकते हैं !

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    April 15, 2010

    सर प्रणाम , आपकी बात सही है…. समस्या मानसिकता की ही है .. पर दूसरा पहलु ये भी है की इतने विरोधो और ढुलमुल रवैये के बाद भी हिंदी की गति थमी नहीं है…और ये सतत प्रयत्नशील है अपने पद को पाने के लिए … हमें शिक्षित वर्ग को जागरूक करना होगा .. जागरण के इस मंच को ही ले लीजिये …. इसे हिंदी में सोशल नेटवर्क के रूप में प्रचारित किया गया है … और प्रतिदिन सैकड़ो लेख इस्पे हिंदी भाषा में आ रहे है ये अच्छा है हिंदी के प्रचार के लिए …. इस्पे कुछ जागरण के लोग भी ऐसे है जो अंग्रेजी में लिखने लगते है वे भूल जाते है की इससे उनके इस प्रयास में ही रुकावट पैदा होती है …पर कौन समझाए….लेकिन कोई बात नहीं …… आने वाला समय हिंदी के पक्ष में करने के लिए राष्ट्रवादी तत्त्व जरुर प्रयास करेंगे ऐसा मेरा विशवास है ….. जागरण पे हम लोग है ही .. जहा सक्रिय प्रयास करने की आवश्यकता होगी की जाएगी …

Arunesh Mishra के द्वारा
April 13, 2010

मित्र निखिल, मनोज जी ने सही कहा है. इतनी जानकारी हिंदी के बारे में एक जगह मिलना मुश्किल है. आप ये जानकारी हमारे साथ साझा कर के बड़ा ही नेक कम काम कर रहे है.

    nikhil pandey के द्वारा
    March 28, 2011

    धन्यवाद

NIKHIL PANDEY के द्वारा
April 13, 2010

हिंदी प्रेमियों से अनुरोध है की अगर इस विषय पर तथ्य(facts) मिले तो जरुर दे ताकि लेख को ज्यादा ज्ञानवर्धक और उपयोगी बनाया जा सके ….. धन्यवाद

Jasbir Singh Rajpoot के द्वारा
April 13, 2010

निखिल जी आप ने काफी अछा मुदा उठाया है इसके लिए आपको बहुत बहुत धनियावाद. निखिल जी मेरे विचार से हिंदी की इस दुर्दशा के लिए हमारा उच्च वर्ग जयादा जिमेदार है जो की हिंदी बोलने को भी अपमान मानते है. और ये हमारे समाज की एक बुरी आदत है की पूरा मध्यम और निम्न वर्ग उच्च वर्ग का के नक्से कदम पर ही चलता है.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    April 13, 2010

    जी जसबीर जी आपका विश्लेषण एक दम सही है ..किसी भी देशकाल में निम्न वर्ग उच्च वर्ग का ही अनुगमन करता है उसकी रहन सहन चाल ढाल की नक़ल करता है… इसलिए उच्च वर्ग को ज्यादा जिम्मेदार और संयमित होना चाहिए जबकि इसके ठीक विपरीत होता है…. यही वर्ग सबसे ज्यादा अराजक है… तो निम्न वर्ग से ही सारी उम्मीदे करना कहा तक उचित है .. धन्यवाद आपके सहयोग के लिए… हिंदी की मशाल अब हमें उठानी ही होगी अन्यथा हम नए साम्राज्यवाद से निकल नहीं पाएंगे….एक अनुरोध है हिंदी के सभी प्रेमियों से की अगर इस विषय पर कुछ तथ्य हो तो जरुर दे.. ताकि इस विषय को ज्ञानवर्धक भी बनाया जा सके….

manoj के द्वारा
April 13, 2010

निखिल जी,. आपके पोस्ट द्वारा हिंदी के बारे मॆं इतना जानने को मिल रहा है जितना शायद ही किसी किताब में हो. हिंदी भारत की मातृभाषा है और आज हालात ऐसे है कि हमॆं इसके अस्तितव के लिए जागृति फैलानी पड रही है. मुझे पूरी उम्मीद है कि आपकी यह कोशिश जरुर रंग लाएगी.

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    April 13, 2010

    मनोज जी सबसे पहले तो आपको धन्यवाद … उत्साहवर्धन के लिए .. समस्या हमारी मानसिकता है ..हम साम्राज्यवादी बन्धनों से अभी तक आजाद नहीं हुए बल्कि एक नए प्रकार के साम्राज्यवाद में घिरते जा रहे है …जो की आर्थिक साम्राज्यवाद है . और इसका हथियार इस बार भी वही मैकाले का बनाया हुआ वर्ग है जो रक्त से भारतीय है मगर उसकी भाषा ,भूषा ,भोजन व्यवहार सबकुछ आयातित है… इसलिए वह वर्ग किसी तरह की राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए सक्रियता दिखायेगा ये सोचना ही बेमानी है …हिंदी राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है , इसलिए हमें ही पहल करनी होगी .. क्योकि ये ही वह डोर है जो भारत को बंधे रख सकती है इसे मजबूत करने की jarurat है , मैकाले की संताने इसका विरोध ही करेंगी …..


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