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सर झुकाकर आसमा को देखिये ………..

राष्ट्रवादी,राजनीतिक,सामाजिक चर्चा,विचार मंथन

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NIKHIL PANDEY


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कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है

Posted On: 5 Mar, 2011  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

74 Comments

दिखावे का भी दोष है ….

Posted On: 3 Mar, 2011  
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जनरल डब्बा में

41 Comments

तू ही मन मीत है-“Valentine Contest”

Posted On: 14 Feb, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

24 Comments

”कौन है उस और ?-Valentine Contest”

Posted On: 12 Feb, 2011  
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कविता जनरल डब्बा में

36 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: nikhil

के द्वारा: AP Singh

के द्वारा: Chen Singh deora

आदरणीय बड़े भैया नित्य दिनों का प्रणाम आपका आज का लेख निश्चय ही एक गंभीर प्रश्न की ओर इंगित करता है जो देश की अश्मिता से सम्बंधित है निश्चित ही एक सच्चा हिन्दुस्तानी किसी की कला की प्रशंसा देश की कीमत पर नहीं कर सकता , बड़े पद पर आसीन कोई व्यक्ति ही क्यों न हो.. यदि ऐसा है तो वह अपने भारतीय होने के गौरव पर प्रश्नचिंह लगा रहा है और इस परिवेश में ये कदापि स्वीकार नहीं हो सकता............ भारत सर्वधर्म समभाव का देश जरुर है परन्तु अपने भारतीयता के धर्म से कदापि अलग नहीं , वरन ये ऐसी विभिन्न धर्मो की शरणस्थली है इसका ये मतलब नहीं की कही से आया कोई मानसिक उत्कंठा से भरा मकबूल फ़िदा हुसैन सरीखा व्यक्ति अपनी अमर्यादित कला का घिनौना प्रदर्शन करके प्रशंसा का पात्र बन जाये और देश का नेतृत्व कर रहे विचारहीन कुत्सित राजनेता उसे राष्ट्र के गौरव का मान दे ....... राष्ट्र की गरिमा का विश्व पटल पर जो माखौल बना रहे प्रतिनिधित्व करने वाले तुगलक सरीखे प्रधानमंत्री को देश का आम देशभक्त बर्दास्त नहीं करने वाला. और अंत में आपसे उस आम देश्बक्त के तौर पर कहना चाहूँगा की ये राष्ट्रीय मुक्ति है उस कलंक से जो एक कुत्सित कला के व्यक्ति ने लगे थी............ वन्देमातरम.....जय हिंद, हिंदी, हिंदुस्तान

के द्वारा: Dr. Naveen Pandey

भाई सर्वप्रथम आपको इस लेख के लिए धन्यवाद जो आपने सब तक ये सन्देश ओउर जानकारी पहुचई हम तो बस यही कहेंगे हुसैन की मौत देश की मुक्ति ही इतने पापी इंसान से जिसने करोडो भारतीयों को लज्जित करने का नारकीय कार्य किया हो जिसे माता का स्थान दिए गया हो उसे नग्न फोटो पर बनाना क्या है शायद वो किसी माता की नहीं जानवर की ओउलाद था तभी तो माता क्या होती है जान न सका नहीं तो शायद ये करते समय उसकी रूह कांप जाती जन्हा तक आपने प्रधानमंत्री जी की बात की अब हम आप किसी (*********************) ऐसे इसान के बारे में क्या कह सकते है जो खुद शायद आपनी मर्जी से छीक भी नहीं सकता तो वो बेचारा तो वही बलेगा जो बोलने को कहा जायेगा नहीं तो वोट बैंक खराब हो जायेगा न हाँ अगर बाबा रामदेव पर लड़ी चलने की बात हो तो आदेश तुरंत आजाता है ओउर क्या कहे

के द्वारा: Shailu Mishra

के द्वारा: nikhil

के द्वारा: nikhil

आदरणीय बड़े भैया सादर प्रणाम नित्य दिनों की भांति आज भी आपका लेख पढ़ा जो निश्चित ही वर्तमान लोकतंत्र के काले अध्याय का सारगर्भित संकलन है , इस प्रकार के कायरतापूर्ण कार्य पर भी यदि चेतना नहीं जागृत हो तो यह नितांत कष्टकारी होने वाला है आने वाले दिनों में ................. आज सत्याग्रह का दमन एक और परतंत्रता की ओर अग्रसरित है.......... और अबकी लड़ाई भयावह इसलिए होगी क्योकि आज गाँधी , सुभाष, भगत नहीं मिलने वाले हाँ सिब्बल जैसे डायर दिग्विजय जैसे डगलस की भरमार है................. एक संघर्ष देश की आज़ादी के लिए थी और अब जरुरत है अपने हितो के लिए अपनी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना.......... वो भी ऐसे देश में जिस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,

के द्वारा: Dr. Naveen Pandey

सारगर्भित लेख के लिए आपका आभार व्यक्त करते शुभकामना अपने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है कि भट्टा-परसौल में जहा किसानो के भेष में आपराधिक तत्यो ने जिन्होने सरकारी कर्मचारियो का अपहरद किया था और उन्हें मुक्त करने गए अधिकारिओ पर असलहो से हमला किया और उसमे जिलाधीश तक को गोली मरी गयी वह यह बहुरुपिया युवराज जिसकी निष्ठां तक संदिग्ध है कानून की धज्जिया उडाता पहुच कर अशांति पहुचने की नाकाम कोशिस की,और मात्र राजनितिक रोटिया सकने के लिए ७४ लोगो की हत्या तथा महिलाओ के साथ बलात्कार का झूठा,और फरेबी बयान ही नहीं दिया प्रधानमंत्री जो एकतरह से उसके घरेलु नौकर की तरह व्यवहार करते हुए उसकी लफ्फाजियो को इतना महत्व दिया और अपने अधिकारों का अतिक्रमद करते हुए सहायता राशी जारी की वह उनकी साम्राजवादी चाकरी का घ्रिदित उदाह्रद है. और आज जब सर्वोच्च न्यायालय तक इसे अलोक्तान्त्रन्रिक घोषित कर नोटिस जारी किया तो हमारे बंधक ध्रितराष्ट्र शिखंडी मनमोहन घटना को दुर्भाग्य्पुर्द लेकिन आवश्यक बताने और सम्राज्ञी तथा युवराज के आगे शिखंडी की भूमिका में फिर अवतरित हुए भट्टा-परसौल के किसानो की तो गलती थी कि उन लोगो ने कानून हाथ में लिया लेकिन शाहरुख़,सलमान को आदर्श मन उन्ही से प्रेरदा ले एक स्टंट कर विदुशाको की टोली में शामिल हो उत्तर प्रदेश को जीतने का ख्वाब कनिष्क सिंह के बेडरूम में देखते रहे यहाँ उनकी नाक के नीचे इतने बड़े पुलिसिया तांडव जिसमे कैमरों के सामने महिलाओ,बच्चो,वृधो पर अमानुषिक कार्यवाही को टी.वी.पर देखते हुए खिलखिला रहे थे माँ-बेटे विजय केक काटते और आन्दोलन की कुचलने की ख़ुशी मानते रहे. यह भारतीय खून नहीं हो सकता इन दोनों के अंदर विदेशी इटालियन जीवाणु है. इनके अंदर मानवीय मूल्यों का सर्वथा आभाव है इसका गुरु भी मध्य प्रदेश से खदेड़ा गया दिग्गी है जिसे तत्काल मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह लोगो को कटाने दौड़ेगा कि यह आर.एस.एस. का है हमें लगता है कि दिग्गी राजा की बचपन की कोई आर.एस.एस. से जुडी फूहड़ यादे है जो इसे चैन से रहने नहीं देती इसे हर मामले में वही कुछ-नकुछ बकने को विवश कराती रहती है. आखिर यहाँ हो क्या रहा है क्या किसी खास संप्रदाय का होने की वजह से इन अर्ध्विदेशी और अर्धैसी-अर्धाहिंदु खानदान और उसके वारिस के अतिरिक्त किसी को बोलने का अधिकार नहीं है आज से नहीं इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के विदेशी खातो को जेर्मनी तथा any samachar patro ने नंबर के साथ प्रकाशित किया है और उसका खण्डन भी इस परिवार द्वारा नहीं किया गया है ( सम्पुर्द जानकारी के लिए सुरेशचिपुलकर के महाजाल पर देखे सोनिया गाँधी को कितना जानते है देखे) शायद यही वजह है कि यह सरकार किसी कीमत पर काले धन के बारे में कुछ करना नहीं चाहती नहीं तो एक आम आदमी को भी ज्ञात है कि इस काले धन को वापस लेन से कितना फायदा देश को होगा लेकिन यहाँ तो काले धन की बात करने का मतलब सोनिया रूपी साढ़ को लाल कपडा दिखाना लगता है,इसी के वशीभूत काले धन के मुद्दे बाबा को पहले वी.वी.पी.आई. सम्मान दिया गया जो घूश के रूप में था लेकिन जब बाबा अड़े रहे कि काले धन को राष्ट्रिय संपत्ति घोषित किया जय तो बाबा और उनके साथ के पुरुषो,महिलाओ और बच्चो तक को तोड़ डाला गया. इनदोनो के पास नातो कोई दृष्टि है और नहीं इस देश की मिटटी से कोई मोह आपलोग भूले नहीं होगे जब १९७१ के युध्ध में इसने राजीव को छुट्टी लेने को बाध्य किया और शर्मनाक तरीके से पुरे देश में अकेला पायलेट रहा जो छुट्टी बिताने इटली की रह पकड ली कभी इटली के दूतावास में शरण ली. अबतक तो इनकी निष्ठां संदिग्ध्ध रही लेकिन इस लोमहर्षक घटना के बाद युवराज का अपने मम्मी के पल्लू में छिपने में ही अपनी भलाई समझी. यहाँ की जनता सीधी है नहीं तो इस बहुरूपिए को जूतों से पीटना चाहिए रहा सवाल दिग्गी का तो हम लगभग १५० लोगो ने अभियान चलाया है कि इसकी बाते पढ़े-लिखे लोग अपनी बात-चीत में इसका तिरस्कार करे यह उसी का पात्र है बुध्ध्जिवियो को इसके किसी बात का कोई नोटिस नहीं लेना चाहिए. मई कहा बहक गया बात आपके लेख की हो रही थी,जो बहुत प्रभावशाली तरीके से अपने रखा इसके लिए आपको को पुनह धन्यवाद इसी तरह के लेख लिख हम लोगो की भावनाओ को अभिव्यक्त करते रहे |

के द्वारा: shuklaom

अलका जी मौलिक बात ये ही है सबके सामने आप के हित रामदेव से प्रभावित हो रहे थे .. पर वह जो लोग थे जो बहु बेटिया थी वे इस देश की आम जनता थे .स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक .. उनसे ऐसा बर्बर व्यवहार करना इतना शर्मनाक है की की हम कैसे कहे की यह एक आपातकाल जैसी स्थिति नहीं है ? सोनिया और राहुल को अगर शर्म नाम की चीज हो तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए ...महिलाओं के साथ इतना शर्मनाक व्यवहार करने वाली पुलिस और उन्हें आदेश देने वाले सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को लोकतांतत्रिक मूल्यों को कुचलने के आरोप में राष्ट्रद्रोह के लिए दी जाने वाली सजा देनी चाहिए .. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल जी......... बाबा का विरोध करने वाले कई लोगों की परेशानी यह है की आखिर कैसे कोई साधारण सा आदमी साइकिल से चर्टेट प्लेन तक पहुँच सकता है…… वो भी एक बड़े जन समर्थन के साथ…… कैसे एक साधारण भगवा धोती पहनने वाला कई कंपनियों का स्वामी हो सकता है….. कैसे कोई आदमी राख मे भी हाथ डाल कर वहाँ से भी सोना निकाल रहा है….. कैसे भगवा धारी एक आदमी अपने पीछे जनसैलाब जमा कर सरकार बदलने की क्षमता दिखा रहा है……. अगर आरएसएस भ्रष्ट है …… अगर बीजेपी भ्रष्ट है …… अगर बाबा रामदेव के पास काला धन है तो फिर क्यों सरकार काले धन के स्वामियों को मृत्युदंड देने की मांग से कतरा रही है॥ क्या काँग्रेस आरएसएस या बीजेपी या भ्रष्ट बाबा से मिली है……. जो उनको बचाने के लिए इस बिल को पास नहीं होने देना चाहती…….. क्यों लोकपाल सरकार के गले की हड्डी बना है……. जब तक आप जैसे लोग ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी…… और एक राष्ट्रहित के विषय पर आंदोलन करने वाले को ठग कहने वालों का समर्थन करेंगे………. तब तक भारत केवल शब्दों मे ही आज़ाद रहेगा…….. धरती की कसम अंबर की कसम, ये ताना बाना बदलेगा तू खुद को बदल तू खुद को बदल, तब तो ये जमाना बदलेगा

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

निखिल जी मुद्दा ये है की लोगों को मारा क्यूँ? आधी रात को सोये हुए लोगों को जिस बेरहमी से मारा गया उसका प्रतिकार क्या है? क्या वो जानवर थे? या उन्होंने कोई अपराध किया था? जिन मुद्दों को ले वो सामने गए थे, क्या उनका समाधान उनको दे दिया गया था? या आपके समाधान देने बाद भी वो वहीं पे डट गए थे? क्या उनको कोई टाइम दिया गया था वहां से हटने के लिए ? इतने संवेदन हीन हो गए थे की बच्चो बुजुर्गों औरतों को घेर घेर के जानवरों की तरह मारा पीता गया, और तो और इलाज भी नही दिया गया, अब युवराज कहाँ गए? अब शायद उनका माथा गर्व से ऊंचा हो गया होगा? आज सच में दिल रो रहा है, अपने ही देश में अपने ही लोगों के हाथो ये शर्मनाक खेल खेला गया. गुलामों से भी बदतर स्थिति. और लालू, सिब्बल, दिग्विजय और पुलिस के लोग कह रहे हैं की कुछ नही हुआ किसी को कोई चोट नही आई. धिक्कार है ऐसे लोगों पे और उनकी मानसिकता पे.

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: nikhil pandey

निखिल जी नमस्कार ,आपने बहुत ही अच्छा विषय(सभ्यता -संस्कृति का ) उठाया हैं. आज हमारी सभ्यता और संस्कृति विलुप्त होती जा रही हैं. फिर भी कुछ लोग हैं जो इसे बचा कर रख रहे हैं. मेरा तो यही मानना हैं की हम आधुनिकता की दौर में शामिल हो लेकिन अपनी सभ्यता संस्कृति को बचा कर.उस कॉलेज के छात्र -छात्राओ और प्रिंसिपल को मेरी और से हार्दिक बधाई. हमें अपनी सोच को आधुनिक रखना चाहिए न की आधुनिकता के नाम पर सभ्यता और संस्कृति को खतरे में डालना चाहिए. हा यहाँ यह बात कहना प्रांसगिक होगा की सभ्यता -संस्कृति के नाम पर कुरीतियों को बढ़ावा न दिया जाये. आपकी यह लाइन बिलकुल सटीक हैं "कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है" बढ़िया लेख .जय हिंद जय भारत नाम -अमित कुमार गुप्ता हाजीपुर वैशाली बिहार

के द्वारा: AMIT KR GUPTA

आदरणीय अग्रज अभिवादन, इस तरह के अपवादों को जन्म देने वालों को नमन, किन्तु सिर्फ नमन karane से हमारा दायित्व ख़तम नहीं हो जाता, हमें मिलकर इन अपवादों को प्रचलन में लाना होगा.. जब ये प्रचलन में आ जायेंगे तभी इन अपवाद देने वाले लोगों के साहस का समुचित सम्मान हो सकेगा | वस्तुतः: अगर निष्पक्ष होकर मनन करें, तो हम पाते हैं कि हम आज भी कहीं न कहीं उन बेड़ियों को आभूषणों की तरह संजोकर रखे हैं | जो हमारी पारम्परिकता को चुनौती देती रहतीं हैं | ब्लैक गाउन भी उन्ही चुनिन्दा बेड़ियों में से है जिसे हम आभूषणों की तरह पहनते हैं | जब तक भारतावारी अपना सम्मान करना नहीं सीख पायेंगे तब तक, विश्व के अन्य देशों से अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, और मानव मूल्यों के सम्मान की सोचना कहीं न कहीं ..... अपूर्ण और असंगत लगाने लगती है | ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- अच्छे लेख के लिए बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: nikhil

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के द्वारा: nikhil

के द्वारा: nikhil

के द्वारा: nikhil

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

प्रिय निखिल जी अभिवादन, जैसे की आपने कहा था, वैसे ही मै भी कभी ब्लॉग प्रमोट नहीं करता. पर इस तरह के लेख और विचार तो मैं कहता हूँ कि आप न केवल प्रमोट कीजिये बल्कि हक़ से लोगों के मुंह पर दे मारिये. मैं तो खुद ही इस तरह के विचारों और संस्कृति का प्रबल समर्थक रहा हूँ और आप यदि मेरे पिछले लेखों पर जायेंगे तो देखेंगे कि मैंने हमेशा सरस्वती शिशु मंदिरों की शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी स्कूलों की शिक्षा पद्धति से ज्यादा बेहतर माना है. मेरी तो समझ में नहीं आता कि इस तरह की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं होती. अभी पिछले वर्ष की ही बात है जब पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने एक दीक्षांत समारोह में अपना कन्वोकेशन गाउन अचानक उतार दिया था और इसे अंगरेजी बर्बरता का प्रतीक बताया था. हालांकि वो उनकी दिखावे की नौटंकी थी. पर ईमानदारी से इसकी पहल होनी ही चाहिए तभी हम अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा कर पायेंगे. डा. प्रदीप राव जी को मेरी 'हैट्स ऑफ' और आपको भी इस ब्लॉग के लिए बधाई.

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: suman

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

आदरणीय निखिल जी सादर अभिवादन ! दिखावा समाज में फ़ैली एक संक्रामक बिमारी है, और ये दिखावा आयोजन विशेष में ही न होकर जीवन के हर पल में लोगों के साथ साथ चलता हैं, उदाहरण के लिए लोग दिनक जीवन में प्रयोग की जाने वाली वस्तुएं, और सेवायें उपभोग में लाते हैं, जिनके साथ किसी अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी या किसी चर्चित व्यक्तित्व का नाम जुदा होता है | जबकि दूसरे उत्पादों जिनके उपभोग से पर्याप्त बचत की जा सकती है, जिनमे गुणात्मकता तो है, किन्तु विज्ञापन की मदों से कटौती के कारण सस्ते हैं | और आयोजनों के समय तो इनका क्या पूछना दिखावे के लिए पैसे और अन्य ( संसाधन ) बहा दिए जाते हैं ..... बढ़िया लेख बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: nikhil

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के द्वारा: nikhil

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के द्वारा: nikhil

प्रेम की व्यापक प्रकृति पर सुन्दर लेख के साथ साथ प्रेम पूर्ण कविता मन को प्रसन्न कर गयी आपकी कविता बहुत ही अच्छी है आप बहुत अच्छी कवितायें लिखते हैं | कविता के भाव गति और लयात्मकता से सुखद अनुभूति होती है आभार --------------------------------------------------------------- इस भटकती नजर का ठिकाना बना , दिल तुम्हारा मेरा आशियाना बना . भूल बैठा हु सारे जहा को मै अब …… एक नजर का असर उम्र भर के लिए --------------------------------------------------- कोई राधा बनी ,कोई कान्हा हुआ , राम का दास तुलसी दीवाना हुआ . प्रेम है सारे जग में भरा देख लो, कोई तन्हा किधर उम्र भर के लिए ………. प्यार का है असर उम्र भर के लिए , ये सुहाना सफ़र उम्र भर के लिए ---------------------------------------------- बहुत सुन्दर लगीं

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

बहुत सुन्दर मैं तो हंसी रोक ही नहीं पा रहा हूँ ..... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- अरे यार क्या लिखू सब तो इन लोगो ने लिख ही दिया है अब कांटेस्ट बीत जायगा तब लिखूंगा और अगर शादी नहीं हुई होती तो कुछ लिखने को भी होता …. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- क्योकि आखिर प्रेम तो हमने भी किया है हम तो बचपन से ही प्रेमी रहे ..याद नहीं कितने दफा सिंगल हुए कितने दफा कमिटेड .. .. हर 3 महीने पर आर्कुट पर स्टेटस बदलना पड़ता था ,, जबतक मैरेड नहीं हो गए... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- विशेष ————— पार्को ,सिनेमाहालो इत्यादि सार्वजनिक स्थलों को बख्श दे .. आपके क्रियाकलाप बच्चो पर बुरा प्रभाव डाल सकते है .ये जीवन के बहुमूल्य 7 दिन है. आपने बहुत स्वस्थ मनोरंजक और प्रसंशनीय आह्वाहन करता लेख पढ़कर अच्छा लगा आभार | आप गंभीर लेखों के साथ मनोरंजक और व्यंग लेखों और कविताओं में भी अच्छी निपुदाता रखते हैं | बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

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के द्वारा: versha

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के द्वारा: NIKHIL PANDEY

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के द्वारा: nikhil

आदरणीय प्रीतम जी . ..विनम्रता के साथ कहना चाहता हु की .ये कहानी नहीं है ... आपकी बाते और सुझाव सही है हमें स्वयं ही जागरूक रहना पड़ेगा .. लेकिन मै आपको बताना चाहूँगा की हमारे देश में कई लाख करोण की मात्रा में जाली नोट है ... और तमाम सरकारी दावो के बावजूद इनकी तस्करी और आवाजाही जारी है ... आपके द्वार बताई गई सावधानिय हर कोई नहीं कर सकता .. क्योकि हर किसी के मोबाईल फोन में कैमरे नहीं है....जहा तक बैंको की बात है तो ये बात हम सभी जानते है और लगभग हर सप्ताह पढ़ते है खबरों में की अमुक बैंक के ATM से नकली नोट मिला ... ऐसी घटनाएं आये दिन होती है... कितने बैंको के खिलाफ कार्यवाही हुई है ...? आम ग्राहक ये मान कर चलता है की बहार किसी से लेने में नकली नोट मिलते है . उसे बैंको पर विश्वाश है .... मुख्य बात ये है की अगर कोई अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझकर उस नकली नोट को बैंक में ले जाए .. तो उस नागरिक के प्रति सरकार या बैंक का क्या फर्ज होने चाहिए ... क्योकि नकली नोट वापस करने पर या बैंक में देने पर उसे तो बदले में कुछ भी नहीं मिलता ..उलटे आर्थिक हानी हुई सो हुई पुलिस का चक्कर अलग से फस सकता है .... पर्तिक्रिया और सुझावों के लिए धन्यवाद अब मै सतर्क हु इस मामले में .. प्रयास करता हु की बड़े नोट ही न लू.. .. ATM में इतनी भीड़ होती है की अगर आप वह कैमरा सेट करने लगे तो लोग बहार से गालिया देना शुरू कर देंगे ....वास्तव में ये सभी उपाय नहीं है .. इसका उपाय है जाली नोटों की तस्करी में पकडे जाने वालो पर कठोरतम सजा का प्रावधान हो जैसे चीन या अरब देशो में है ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

आदरणीय डा साहब ...अभिवादन...... मै एक बात नहीं समझ पाता हु की ...आखिर कांग्रेस सरकार और कुछ और तथाकथित वर्ग विशेष का विशेष ख़याल रखने वाली पार्टिया अपने अन्दर नहीं झाकती क्या ...मै भाजपा से ज्यादा सांप्रदायिक इन्हें मानता हु ये तो साफ़ साफ़ बंटवारे की और भारतीय समाज को दो भागो में बांटने की शाजिश रची जा रही है .... क्या कांग्रेस ने सोचा की लाल चौक और तिरंगे पर इस हद तक जाकर विरोध करने का क्या परिणाम होगा और अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर देश की क्या छवि बनेगी... इस देश के प्रतिनिधि किसी हिस्से में राष्ट्रध्वज फहराने पर ही एकमत नहीं हो रहे.... दुखद किन्तु सत्य ही की इस प्रकरण से कश्मीर में अलगाववाद को गुणात्मक मजबूती मिलेगी... और अंतर्राष्ट्रीय मंचो में कश्मीर भारत का नहीं बल्कि भारत में भी एक विवादित मुद्दा माना जायेगा .. मैंने कोई काल्पनिक कथा नहीं लिखी ... ये वास्तविक बात चित के अंश थे जो एक आम कश्मीरी से हुई थी और मै इस नतीजे पर पंहुचा हु की हमारी सरकारे कश्मीर पर पुरे राष्ट्र के सामने एक भ्रमजाल सा बनाये हुए है ...... आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल जी ! एक ज्वलंत समस्या पर काल्पनिक खानी द्वारा प्रकाश डाल कर आपने सराहनीय लेख लिखा है | ये स्थिति तब पैदा होती है जब हम नोट को बारीकी से नहीं देखते | बैंक से नोट लेते ही एक एक को उन सारे पहलुओं से परखना चाहिए और अगर शक है तो वहीं बैंक काउंटर पर ही बदलना चाहिए | इस स्थिति में अगर आप चाहें तो बैंक के खिलाफ कानूनी करवाई भी होगी और बैंक के अन्दर जो virus इस धंदे में लगा है वो पकड़ा जायेगा | अगर आप ATM से निकाल रहे हों तो मशीन के सामने अपने मोबाइल का कैमरा चालू करके निकालें जिस पर नोटों के नम्बर आने चाहियें | इस तरह आप ये साबित कर सकेंगे के ये नोट ATM से ही निकला था | थोडा झंझट तो है पर अगर हर व्यक्ति सावधान रहे तो कुछ हद तक जाली नोट का काला कारोबार रोका जा सकता है | ये चीजें प्रगति के side effects हैं , होते ही रहेंगे, नई पीढ़ी के बीच कुछ ऐसे तत्व पैदा होते ही रहेंगे जो काले बाजार की पैदाईश हैं | इस में जादातर पुलिस और नौकरशाहों की संतानें मिलेंगी | दाऊद भी तो एक पुलिस वाले का बेटा है !

के द्वारा: preetam thakur

मित्र आपका आक्रोश अनुचित नहीं है .. राजनैतिक लाभ के लिए ऐसे बहुत से काम नेताओं द्वारा किये जाते है ..लेकिन यह एक बात आप ही बताये जब लाल चौक पर अलगावादी पकिस्तान का झंडा फहरा देते है तब कोई इतना बड़ा मुद्दा क्यों नहीं बनता .. ये तिरंगा यात्रा राजनैतिक थी तो राजनैतिक ही सही ..पुरे देश को हर पार्टी को इसमें शामिल होना चाहिए था ताकि अलगाववादियों को ये पता चले की पूरा देश इस मुद्दे पर एक मत है... इस तरह के विरोध पर तो पूरी दुनिया में एक गलत सन्देश गया है की कश्मीर मुद्दे पर भारत के ही लोग विभाजित है.... क्या ये ठीक है हमने खुद ही कश्मीर को विवादित बता कर पकिस्तान को एक मौका दे दिया है ...अधिकांश लोग कह रहे है की लाल चौक क्यों... मई कहता हु की लाल चौक भी क्यों नहीं ... आखिर तिरंगा फहराना है कोई खाई तो नहीं बनाना है ......... आपने पढ़कर प्रतिक्रिया दी इसके लिए आभार

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: vidhayasagar

आदरणीय शैलेन्द्र जी ... आपकी बात से मै सहमत हु .. लेकिन लाल चौक पर १९९३ की घटना के बाद एक नकारात्मक सन्देश भारतीय सेना और सरकार के विरुद्ध कश्मीरी जनमानस में गया जिसे इन अलगाववादियों ने भुनाया है और वह की अवाम को भारत के खिलाफ भड़काने में खूब प्रयोग किया है... आपको जानकारी होगी की उसी लाल चौक पर पकिस्तान का झन्डा ये अलगावादी फहरा चुके है ............. हम लाल चौक को उस गलती के प्रायश्चित के रूप में ले सकते थे .. सरकार के लोग और भाजपा के लोग वह जाते कश्मीरी अवाम से उस घटना पर खेद प्रकट करते और तिरंगा फहरा कर उन मुट्ठी भर सियारों को ये सन्देश देते की कश्मीर पर कोई विवाद नहीं है वह पूरी तरह हमारा है और हम उसके है ... सवाल यही है की श्रीनगर ठीक है ... तो लाल चौक पर क्यों नहीं..?.. खैर ये मामला शांत हो गया पर सरकार ने जो रवैया अपनाया था इसपर वह शर्मनाक ही कहा जायेगा.. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल जी , नमस्कार , आपने गणतंत्र -दिवस पर एक बेहतरीन आलेख लिखा उसके लिए साधुवाद ! दरअसल आजादी के बाद इस देश की बागडोर जिन हाथो में थमाया गया वे विदेशी संस्कृति में पले-बढे तथा पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और विकास का मतलब बस शहरो के विकास तक सीमित रख कर चले इस लिए गाँव और कृषि उपेक्षित होते चले गए और यह सिलसिला आज तक चल ही रहा है नतीजा शहर और गाँव के बीच फासले बढ़ते ही जा रहे है एक कृषि -प्रधान देश होने के बावजूद हमें बाहर से अनाज मंगवाना पड़ रहा है ! डाक्टर ,इंजीनियर की फ़ौज तैयार हो रही है मगर वे मोटी कमाई तथा सुविधाभोगी हो जाने के कारण गाँव में जाना नहीं चाहते पूरी व्यवस्था में आमूल -चूल परिवर्तन की आवश्यकता है तभी गणतंत्र का मतलब सार्थक होगा !

के द्वारा: rachna varma

आदरणीय निखिल जी ! सादर अभिवादन ! आप ने बिलकुल सही प्रश्न उठाया है और उचित आह्वाहन किया है .......... हम सब लाल चौक चलना चाहिए ... क्योंकि वर्तमान सरकार का रवैया निंदनीय है, क्योंकि ये हमेश झुकाने का प्रस्ताव रखती रही है, अगर हम झुकते ही रहे हो हमें बार बार झुकाया जाएगा, हर बात के लिए झुकाया जाएगा | आज लाल चौक न जाओ कल दिल्ली न जाओ, परसों अपने घर कार्यालय में झण्डा मत फहराओ .. क्या है ये सब, ये लोग वोट बैंक की राजनीति में लगे हुए हैं, इनको भविष्य से कुछ नहीं लेना, या वहां तक सोच ही नहीं पा रहे हैं .... और अलगाववादी शक्तियों से कब तक भागते रहेंगे ? हमें उनके सामने आना ही होगा .. "शठे शाठ्यम समाचरेत" अच्छे लेख के लिए आभार

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

वाकई काग्रेस की ऐसे झुकना देश के लिए शर्मनाक है...अगर आज अलगाववादियों के आगे झुक कर यह निठल्ली और लाचार सरकार लाल चौक पर झंडा फहराने से रोक रही है तो संभव है कल तो कुछ अलगावादियों के दबाव में सोनिया और मनमोहन सिंह लाल किला पर भी झंडा नही फहराएंगा... मैं आपके विचारों से सहमत हू..... मुझे तो लगता है आज अमत अब्दुला और कश्मीर के अलगावादियों की ताकत भारत के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा है...न जानें कैसे फोब्स पत्रिका ने सोनिया को सबसे शक्तिशाली महिला की लिस्ट में शामिल किया...... ऐसी कमजोर सरकार न आज से पहले कहीं देखी थी और उम्मीद है न ही आज के बाद्फ कभी आएंगी. भ्रष्टाचार इन लोगों से स6भलता नहीं, महंगाई कम नहीं होती. नक्सलवाद और अलगाववाद भी बढ+ रहा है..यार ये सरकार सिर्फ नाम की है.....कुछ नहीं हो सकता भगवान इस सरकार का कार्यकाल जल्दी खत्म कर...

के द्वारा: राहुल

राजीव जी ... निश्चित रूप से .... अब सबक सिखाने का समय अ गया है .... इस बार सड़क दिखानी पड़ेगी...... अब मुझे लगता है सभी की समझ में आ जाना चाहिए की ये छदम सेकुलर लोमड़िया शेरो की खाल में आज सत्ता पर पहुच गई है और इनका निशाना हिन्दू संगठन नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की आत्मा है ..... शर्म आती है की राहुल गाँधी ,दिग्विजय सिंह .. जैसे लोग इस देश की संसद में बैठते है .... इन अधकचरी समझ वाले राजनीतिज्ञ को ये भी पता नहीं की हिन्दू आतंकवाद का जो राग ये पूरी दुनिया को सुना रहे है ..उसे उनकी ही सरकारी एजेंसिया नकार रही है .... इस पर कोई भी पुख्ता सबूत उनके पास नहीं है ... और वो विदेशो में इसका रोना रो रहे है ... उन्हें ये नहीं पता की वे देश को कितनी बड़ी मुसीबत में धकेल रहे है .... और हिन्दू मुस्लिम समाज में एक दिवार खड़ी कर रहे है ... अविश्वाश के जिस बीज को जिन्ना ने बोया था उसमे खाद पानी डाल रहे है ..और ये वृक्ष एक दिन राष्ट्र की ही मिटटी को उखाड़ देगा........... वोट की राजनीती में इतनी गिरावट कभी देखने को नहीं मिली ..जितनी आज ये सेकुलरवाद के नाम पर दिख रही है... राहुल गांधी राजनीती में कितने अपरिपक्व है ये तो स्पष्ट है ..बेहतर ये होगा की कांग्रेस उनकी ब्रांडिंग करने की जगह भारत को समझने की व्यवस्था करे... विश्व पटल पर एक बुरा सन्देश तो गया ही पकिस्तान को भी एक बड़ा अवसर हाथ लगा है ..और भविष्य में इन कथनों का बुरा प्रभाव हमारे आतंरिक और वाह्य नीतियों पर पड़ेगा .. प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

प्रिय आकाश जी .शायद आपको मेरी बात बुरी लगी ....संभवतः मुझे उदाहरण कुछ और लेना चाहिए था.... मगर चातक जी और आप स्वयं बेहतरीन लेखक है और और आप जानते है की इस तरह के प्रयोगों से बाजार का तो भला हो जायेगा ..लेकिन हिंदी के साथ ये एक तरह का मजाक ही कहा जायेगा ..अंग्रेजी सिखने सिखाने का तर्क देना यहाँ उचित नहीं लगता इसके और भी तरीके हो सकते है ..किन्तु यदि आप को मेरी बात गलत लगी हो तो आप मुझे अल्पज्ञानी और बुद्धिहीन समझ कर क्षमा करे ..मेरा उद्देश्य आपको कष्ट पहुचना नहीं था आपकी कविता का प्रयोग मैंने इसीलिए किया ताकि आप समझ सके की ऐसी प्रयोगधर्मिता से हमारे साहित्य का सत्यानाश हो जायेगा.....कृपा करके इसके दूर गामी परिणामो पर ध्यान दे

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

प्रिय आकाश जी ..आपकी भावनाओं की क़द्र करता हु..और प्रतिक्रिया के लिए आभार प्रकट करते हुए सबसे पहले ये कहना चाहूँगा की भाषा आदर और निरादर की सीमा से परे होती है यहाँ आदर सम्मान की बात नहीं है ... लेकिन हमाप और आने वाली पीढ़िय ही वो नेक्स्ट है जिसकी बाते हो रही है... मुझे हैरत है आपने इसका समर्थन की जबकि आप स्वयं एक बेहतरीन कवी और गजलकार है... क्या आप अपनी नै गजल को इस रूप में देखना पसंद करेंगे......?? हसीन मोमेंट्स की पार्टी मना लीजिये, अपनों की नफरत भुला दीजिये, किसी भी मोड़ पर स्टॉप हो जाए ये लाइफ अगर, दो ड्रॉप वाइन की लगा लीजिये.. मुझे क्षमा करे मेरा उद्देश्य केवल ये समझाना था की भाषा के साथ ऐसे प्रयोगों से दूरगामी प्रभाव पड़ते है .. मुश्किल नहीं है की कल को ऐसे प्रयोग कुछ आधुनिक उत्साही लोग करे...और आपका हिंदी साहित्य इन नए प्रयोगों में अपनी खूबसूरती खो दे .... कोई भी पाठक आपकी गजल की पंक्तियों को इस रूप में पढ़कर आनंद नहीं पा सकता ......इससे अंग्रेजी में कमजोर लोग अपने ग्रामर को जितना आता होगा वो भी तबाह कर लेंगे और हिंदी का जो स्वरुप बिगड़ेगा सो ...... अलग..... आपसे विनम्र निवेदन है की इसपर एक बार पुनः विचार करे....

के द्वारा: nikhil pandey

प्रिय चातक जी ..इस तर्क से मै पूरी तरह असहमत हु ..की हिंदी से अंग्रेजी सिखने के लिए ये प्रयोग उचित है.... अंग्रेजी सिखने के कई तरीके है मगर जो उदाहरण मैंने दिया है .... उसे आप न तो हिंदी के लिए उचित कह सकते है न अंग्रेजी के लिए..... क्योकि ये एक प्रकार की खिचड़ी भाषा है..... और ये खिचड़ी भाषा न तो आपको हिंदी ही सिखने देगी न ही अंग्रेजी.... एक उदाहरण ले..... आजकल जब हम सेल फोन पर सन्देश लिखते है तो अंग्रेजी में ही..... देखिये क्या करते है... hi frends vry gd mrng.... i wl cal u latr,   i m buzy ... bt i came vry soon ... tc .. चातक जी ये भी एक प्रयोग ही है मगर ये धीरे धीरे आदत बन चूका है और इस तरह से हम एक भाषा के साथ मजाक कर रहे है.... जहा तक हिंदी से अंग्रेजी सिखने की बात है.... ये आदत हिन्लिश वाली आगे बहुत बुरा रूप ले लेती है.....और आप जानते होंगे की विश्वा में अभी तक ग्रामर के हिसाब से सबसे शुद्ध अंग्रेजी भारत में ही बोली जाती है.... मै इसे बेहद बुरा मानता हु.... आई नेक्स्ट को आसान अंग्रेजी भाषा में निकाल दिया गया होता तो कोई बात नहीं ..लेकिन ये प्रयोग एक प्रकार का बेहूदा मजाक ही है....

के द्वारा: nikhil

प्रिय निखिल जी, आपकी पीड़ा सही है ! परन्तु जैसे की चातक जी ने कहा है अगर वह सत्य है तो यह एक अच्छा प्रयास है ! मैं भी इसे पढना चाहूँगा ! क्योंकि विदेशी भाषा में मेरा हाथ भी तंग है ! फिर जहाँ तक हिंदी के मजाक उड़ाने की बात है तो हमरे नेता और सरकारी संस्थाए ये काम बखूबी निभा रही है ! इसी सन्दर्भ में मेरी कविता इसी मंच पर "हम हिंदी दिवस हैं मनाते" आई थी ! शायद अपने पढ़ी होगी ! यहाँ आपको मैं एक मजेदार बात बताना चाहता हूँ .! 1966 में मुझे बनारस हिन्दू विश्यविद्यालय (BHU )में एडमिशन मिला था ! मैं बस स्टैंड से एक रिक्शा पर बैठा और रिक्शा वाले को विश्यविद्यालय चलने को कहा ! वो रिक्शा वाला लगभा एक घंटा तक मुझे घुमाता रहा ! मैंने हार कर उससे पूछा _ क्या यूनिवर्सिटी इतनी दूर है ! तो रिक्शा वाले ने हैरान होकर पूछा _ क्या आपको यूनिवर्सिटी जाना है ? जब मैंने हां कहा तो रिक्शा वाला बोला आप मुझे पहले ही हिंदी में बता देते की आपको यूनिवर्सिटी जाना है मैं तो वह से तीन बार गुजर चूका हूँ ! आप तो इंग्लिश में विश्यविद्यालय-विश्यविद्यालय कह रहे थे इसी लिए मैं आपको घुमाता रहा ! आशा है आप मेरा आशय समझ गे होंगे ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

स्नेही श्री निखिल जी, हिंदी भाषा के लिए आपका प्रेम देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई| निश्चय ही किसी भी भाषा के साथ किया गया मज़ाक अशोभनीय के दर्जे में ही रखा जाएगा लेकिन आई-नेक्स्ट भाषा के साथ किसी भी तरह की फूहड़ता नहीं करता है| मैंने इस पत्र को देखा और पढ़ा है और मैं इसे जागरण का एक सराहनीय कदम मानता हूँ| ये एकमात्र ऐसा पत्र है जो अंग्रेजी से हिंदी या हिंदी से अंग्रेजी सीखने वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं| कमोवेश हिंदी से अंग्रेजी सीखने वालों को ध्यान में रखते हुए इस पत्र का प्रकाशन किया जा रहा है| मैं स्वयं भी ऐसे किशोरों और युवको को आई-नेक्स्ट पड़ने की सलाह देता हूँ जो अंग्रेजी बोलना चाहते हैं| आपको बुरा लगा क्योंकि आपने इसे जागरण का समाचार पत्र समझ लिया है लेकिन ऐसा नहीं है ये एक ऐसा पत्र है जो सर्वोत्तम तरीके से language switch over में लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है| आप इसे इसके उपयोग की दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि दैनिक जागरण की तरह ये पत्र भी लाजवाब है| आपने इस ब्लॉग को मंच पर लाकर अच्छा किया क्योंकि बहुत से लोगों को ये भ्रम हो सकता है कि जागरण भाषा के साथ मज़ाक कर रहा है जबकि ऐसा बिलकुल नहीं| विनम्रतापूर्वक आपका चातक

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' प्रिय मित्र निखिल पाण्डेय जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

के द्वारा: Manish Singh "गमेदिल"

के द्वारा: nikhil

आदरणीय जोशी जी .. मुझे याद है हमारे समय में एक विषय होता था नैतिक शिक्षा .. मोरल साईंस और उसमे विशेष रूप हमें अपने व्यवहार ...आचरण के बारे में बताया जाता था और और शायद आप विशवास न करे पर सच है की हमारी प्रधानाचार्य स्वयं हर कक्षा में जाकर बच्चो के व्यवहार सम्बन्धी रिपोर्ट लेती थी और एक बार तो घर से मेरी ही शिकायत माँ ने स्कूल जाकर कर दी... पूरा स्कूल पढाई साथ साथ इन सभी बातो का बहुत ध्यान रखता था.. आज के स्कूल केवल पैसा छपने की मशीन बनते जा रहे है और वे मशीनों को ही पैदा कर रहे है .. तो जाहिर है की मशीने सिर्फ रेस जानती है वे भावनाए नहीं समझती.. वे आजादी से इत्तेफाक रखती है ये कैसे मिली इससे उन्हें कोई मतलब नहीं .............. विस्तृत व्याख्या के लिए आभार

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

प्रिय निखिल जी, एक बार फिर से एक अच्‍छी पोस्‍ट के लिए धन्‍यवाद, आप की पोस्‍ट के अंत में जो गांधी जी की फोटो दिखाई है वह स्‍वंय दर्शा रही है कि बापू कह रहें है, अब हम चलते है क्‍योंकि इस देश व देशवासीयों को अब हमारी जरूरत नहीं है वह 2 अक्‍टूबर को एक लाश की तरह बोझ समझ कर उठा रहें है। आज का हमारा युवा वर्ग आधुनिकता की आंधी में ऐसा फंस चुका है कि वह अपनी पुरातन सभ्‍यता को ही भूल चुका है। यहां इस को बढावा देने में इन आधुनिक विकास का भी एक बहुत बड़ा हाथ है। जिसमे यह टी.वी., वीडियों. कंप्‍यूटर, आदि ने बच्‍चों को इतना इन सब में बांध रखा है कि आज वह न तो शारिरिक तौर पर मजबूत है न ही कोई फिजिकल ऐक्‍सरसाईज करने के लायक रह गए है केवल टी;वी. एवं कंप्‍यूटर तक ही सीमित रह गए है। आप का कहना ठीक है कि इन 15-20 वर्षों ने समाज में एक नया परिवर्तन ला दिया है आज हम गांधी ज्‍यंती या नेहरु ज्‍यंती या शिक्षक दिवस की बात न भी करें तो कोई बात नही पर अब तो यह नई पीढी के बीच इन त्‍योहारो का महत्‍व भी खत्‍म सा हो गया है। स्‍कूलों में भी आज कर्मशियलाजेशन सा हो गया है, वह एक दो टिचर एंगेज कर लेते है और नए नए खेलो के लिए अभिवावकों को अपने बच्‍चों को उस में भाग लेने के लिए दवाब डालते है। मात्र पहली व दूसरी कक्षा के बच्‍चों को टेनिस, व ताईकान्‍डों खेलने के लिए वह प्रति बच्‍चे से 400 से 600 रूपये वसूलते है। अब इन्‍हे कौन समझाए की टेनिस (लान टैनिस) के बैट के बराबर जिस बच्‍चे की हाईट है क्‍या वह टैनिस का बैट पकड सकता है। पर हमे मजबूरी मे स्‍कूल को पैसा देना ही पडता है। संस्‍कारों को बढावा देने से ज्‍यादा वह लोग अपना फायदा ज्‍यादा देखते है। और हम अपंग से उन की राह चल पडते है। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने निखिल जी राष्ट्रपिता के सम्मान में … बहुत-बहुत बधाई । लेकिन शिकायत है कि आपने एक जगह भी राष्ट्रपिता नहीं कहा । जिनसे हम अपेक्षाएं कर रहे हैं कि हो रहे अपमान पर संज्ञान लेकर कुछ करें, वही लोग तो हैं जिन्होंने जीते जी गाँधी को अप्रासंगिक बनाकर हाशिये पर धकेल दिया था । सत्ता के लालच में अंग्रेज़ों से समझौता कर भारत को बांट दिया, और गोली भी उसी संत के कंधे पर बंदूक रखकर चलाई । गांधी अपने आखिरी दिनों में अत्यंत दुखी थे अपने बन्दरों की करतूत से, सभी जानते हैं । अफ़्रीका से लौटने के बाद उनकी जीवन भर की तपस्या के साथ जो बलात्कार किया गया, उससे उनकी आत्मा वैसे भी तार-तार हो चुकी थी, गोड्से को गोली मारने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । बाद में यही इतिहास लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के साथ भी दोहराया गया । अंग्रेज़ों की नीतियों और कानूनों की उपज़ भारतीय राजनीति का घिनौना चेहरा इतना विद्रूप है, कि प्लास्टिक सर्जरी कर इसे पूरी तरह बदले बिना बापू जैसे महापुरुष हमेशा अपमानित होते रहेंगे । आप देखेंगे कि जिन पुत्रों ने भी अपने पिता को जीते जी मारा होगा, उन्हीं के ड्राइंगरूम में पिता का भव्य तैलचित्र और उसपर भरपूर मालाएं और पूजन सामग्री मिलेगी । कुछ ऐसा ही चरित्र हमारे राजपुत्रों का भी है । आज के बच्चे तो फ़िर भी ग्लोबलाइज्ड माहौल में पैदा हो रहे हैं, और हमारे द्वारा अपने पिताओं को अपमानित करने के प्रत्यक्षदर्शी भी हैं, तो उनसे हम उम्मीद ही क्यों करें? साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

मित्रो वास्तव में मै व्यंग्यकार नहीं हु .. और यह मेरा पहला व्यंग है ..जो हद तक बढे गुस्से का परिणाम है ..मिडिया की टी आर पी की दौड़ के बाद जो उसका नया स्वरुप देखता हु उससे एक अजीब सी चिढ मन में बन चुकी है इस वजह से अब न्यूज़ चैनल देखना बड़ा सर दर्द हो चूका है और मिडिया पर लिखना तो और भी ज्यादा मुश्किल... २ दिन पहले चैनल बदलते वक्त अचानक इंडिया टीवी पे कैटरिना को देखा तो अकबर बादशाह की तरह मै भी रूक गया और देखने लगा .. उस समय एक महत्वपूर्ण कार्य करना था मुझे ..पर देखने में लग गया ... आधे घंटे तक उस रिपोर्टर ने कैटरिना और उनकी ड्रेस के परेशानी की जो रिपोर्टिंग दिखाई उसे देख कर सर पीट लिया मैंने .. यकीं ही नहीं हो रहा था की क्या इतनी घटिया रिपोर्टिंग भी हो सकती है क्या मीडिया को इस विशाल विश्व और अरबो की आबादी में और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं दिखा .. ऐसी रिपोर्ट क्या सोच कर दिखाई जाती है ... एक महिला अगर अपने कपड़ो में कही असहज है तो क्या इस तरह से उसे सार्वजनिक रूप से बेहुदे तरीके से दिखाना उचित है .की वह कहा कहा से अपनी ड्रेस ठीक कर रही है कितनी बार ठीक कर रही है .. गुस्सा बहुत ज्यादा था .. खुद पे क्योकि ऐसी वाहियात रिपोर्टिंग में मैंने अपने ४० मिनट बर्बाद कर दिए ..इस लिए व्यंग में बात कही... ..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल जी, आपकी शंका के लिए मीडिया से ज्यादा सरकारी तंत्र जिम्मेदार है..। क्योंकि अयोध्या-फैजाबाद में लोगों को जमानत कराने पर मीडिया नहीं बल्कि प्रशासनिक तंत्र मजबूर कर रहा है, उन्हें नोटिस मीडिया नहीं बिल्क प्रशासन जारी कर रहा है, फोर्स की तैनाती मीडिया नहीं बल्कि प्रशासन कर रहा है, प्रतिबंध भी मीडिया नहीं बल्कि प्रशासन लगा रहा  है.. और सबसे बढ़कर फैसला मीडिया नहीं बल्कि कोर्ट देगा। मीडिया का शाब्दिक अर्थ केवल माध्यम है, जो यथार्थ को प्रस्तुत कर रहा है। मीडिया बता है कि कैसे अयोध्या-फैजाबाद के लोग किस तरह परेशान है, मीडिया बता रहा है कि कैसे अयोध्या-फैजाबाद के लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करते हैं..., मीडिया बता रहा है अयोध्या-फैजाबाद में कभी फसाद नहीं हुआ.. और सबसे बढ़कर मीडिया ही यह बता रहा है कि अयोध्या-फैजाबाद के साथ किस तरह का राजनीतिक छल किया गया..। 

के द्वारा: navneet k srivastava

अनीता जी ,आपकी प्रतिक्रिया किसके प्रति है.....? कुछ पुरुष , अधिकांश पुरुष या सभी पुरुषो के प्रति ?....और क्या आंकलन है आपका की देश की सभी नारिया पुरुष प्रताड़ित ही है ? और आप नारी की कैसी ,कितनी और किस्से स्वतंत्रता चाहती है.....? क्या आपने भारतीय समाज के ढांचे को समझा है ? और क्या आप इसकी तुलना यूरोपीय नारी से कर रही है ? क्या आपका परिवार नमक संस्था में विशवास है? आप से ये बात कहना चाहता हु की आप ने भी अपने विचारो पर उन्ही तथाकथित आधुनिक पश्चिमी विचारो का खुबसूरत और क्रांतिकारी दिखने वाला कवर चढ़ा लिया है जो अन्दर से खोखला है .. आपलोगों ने न तो भारतीय समाज के ढांचे को समझा है न जानने की कोशिश की है मात्र नारे लगाने के समय आगे आकर हंगामा मचाने से नारी शशक्तिकरण नहीं होता..... अगर आप ध्यान देंगी तो ये पाएंगी की आज जो भी नारी शशक्तिकरण का हल्ला किया जा रहा है उसका वास्तविक लाभ केवल उन महिलाओ तक सिमित है जो पहले से ही शाशाक्त है .. दूसरी बात आपको पुरे इतिहास पर एक निगाह डालनी होगी इसे समझने के लिए ..आप भारत और यूरोप में तुलना नहीं कर सकती ...मै आपसे यह पूछना चाहता हु की आप इस जकडन से कैसी मुक्ति चाहती है ? जबकि आज समाज में ये बदलाव दिख रहा है की आज लोगो के मन में लड़की और लड़के का भेद मिट रहा है .......अगर आप परिवर्तन की बात कर रही है तो उसका प्रोग्राम भी बताइए ,आप कैसे और क्या चाहती है ?,,,और तब भी ये समझ ले की नियम मर्यादा और सीमाए रहेंगी ही....चाहे वह पुरुष हो या महिला.... क्योकि ये प्रकृति द्वरा निर्धारित है .. इन्हें तोड़ कर परिवर्तन करेंगी तो इनका साइडइफेक्ट खतरनाक होगा... और यह शब्द जाल नहीं पूर्ण सत्य है ..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

सर मै आपसे १००% सहमत हु इस मंच पर कई ऐसे बेहतरीन लेख आये जिनपर चर्चा honi chahiye thi, पर नहीं की गई और न ही उन लेखको को पुब्लिश ही किया गया .... ये समस्या है और आपकी इस बात को भी स्वीकार करता हु की अनीता जी और ऐसे लेखको पर हम बेवजह चर्चा करने लग जाते है ..असल में होता ये है की ऐसे मंचो पर अक्सर (मै किसी एक की बात नहीं कर रहा ) कोई ऐसा अचानक आता है जो पूरी सार्थक चर्चाओ को एक झटके में अपने ग्लैमर में बहा ले जाता है ...वास्तव में अगर एक अनीता जी का उदाहरण ले तो उनके पुरे लेखो में कुछ भी नहीं निकलकर आता सिवाए विलाप के ,,दुःख के प्रदर्शन के ..मैंने सभी प्रतिक्रियाये नहीं पढ़ी उनके लेखो पर .........मै इस मंच पर बहुत मामूली सा पाठक हु ... पर ये निवदन हर लेखक से है की अगर आपके लेखन में आकर्षण है शक्ति है तो आपकी जिम्मेदारिया कई गुना बढ़ जाती है ...और अगर कोई नकारात्मक विचारो को बढ़ता है उसे पूरी शक्ति से दबा देना सबसे बड़ी प्राथमिकता है .... .... आप इस मंच पर एक जागरूक सदस्य है इसका पता इससे चल जाता है की लगभग हर अछे ब्लॉग पर आपकी टिप्पड़ी देखने को मिलती है और मै उसे पढता भी हु ... धन्यवाद ...कांटेस्ट की वजह से टिप्पड़ी और चर्चा को कम स्थान मिला है सभी केवल अपनी बात कहने में ही लगे रहते है .... धन्यवाद सर...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

पांडे जी मैं आपके विचारों से इत्तफ़ाक़ रखता हूँ । मैं ये नहीं कह रहा कि यदि किसी के विचार आलोच्य हैं तो उसका प्रतिकार प्रतिवाद नहीं होना चाहिये । कोई मंच होता ही है बहस के लिये, जिससे छनकर समाजोपयोगी बातें सामने आएं और एक स्वस्थ माहौल का निर्माण कर पाने में सहायक बनें । मैं कोई अनीता जी के व्यक्तिगत विचार का अन्धसमर्थन करने का भी पक्षधर नहीं हूँ । मेरी टिप्पणी इसलिये है कि ऐसे बहुत से विवादास्पद विचार इस मंच पर आए और गए, जिनपर लम्बी बहस की जा सकती थी । लेकिन एकाध टिप्पणियों के अतिरिक्त कोई खास नोटिस नहीं लिया जाता है । कुछ तो इतने विस्फ़ोटक होते हैं कि सडक पर आ जायँ तो तहलका मच जाय । लेकिन ऐसे विचारों पर देखने में आता है कि हम सभी नो कमेंट की मुद्रा में खामोशी अख्तियार कर लेते हैं । फ़िर ऐसा क्या कहा इस महिला ने कि हम पुरुषों में खलबली सी मच गई है? हम तो खुद ही इन विचारों को पब्लिसिटी दे रहे हैं । मेरा कहना है कि अगर ये कुछ कहना चाहती हैं, तो इन्हें धैर्य से सुनकर तब किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाय, न कि इन्हें हतोत्साहित कर वास्तविकता को तिरोहित होने दिया जाय । मुझे नहीं लगता कि अभी इन्होंने कुछ कहा है, सिवाय भूमिका के । इनका बाक़ी का सारा व्यवहार एक शालीन महिला का ही देखा गया है । इन्होंने न सिर्फ़ शालीन और आत्मीय टिप्पणियाँ लिखी हैं, बल्कि अपने बारे में की गई तल्ख से तल्ख टिप्पणियों का पलट कर कोई प्रतिक्रियात्मक जवाब तक नहीं दिया, जब कि कोई दूसरी महिला, या खुद वैसी होतीं जैसा हमारे दिमाग में है, तो शायद गाली-गलौज़ पर उतर जातीं । इन सच्चाइयों को कैसे झुठलाया जा सकता है?

के द्वारा: आर.एन. शाही

शाही जी, माफ़ कीजियेगा यहाँ गाँव के लडको के झुण्ड जैसी बात नहीं है और न ही मै इस मंच पर कभी व्यक्तिगत टिप्पड़ी करने में यकीं रखता हु ... और जहा तक नारी के सम्मान की बात है तो मै भी उतना ही सम्मान करता हु जितना कोई और, यहाँ बात है की आप कैसे विचारो को बढ़ावा दे रहे है ..अगर ऐसे विचारो को हम बढ़ावा दे रहे है जिनसे समाज के दोनों महत्वपूर्ण आधारों (स्त्री और पुरुष ) के बीच लगातार परस्पर अविश्वास और दूरी बढती जाये तो यह मै कभी उचित नहीं ठहरा सकता .... समस्याये है... नारी के साथ पर ऐसे विचारो से उनका समाधान नहीं हो सकता बल्कि ये नकारात्मक और विध्वंसक विचार है और इनका पुरजोर विरोध होना ही चाहिए..... प्रतिक्रिया के लिए आभार...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

अनीता जी के उद्गारों के बारे में सभी के अपने-अपने विचार रहे हैं, इसमें मतैक्य हो भी नहीं सकता । ओवर-आँल वो भी एक लड़की या महिला हैं, इस नाते तो हम सम्मान ही करना चाहेंगे । मैं व्यक्तिगत छींटाकशी पर यकीन नहीं करता । जब भी उनका मूड हुआ है, उन्होंने सबके ब्लाँग पर जाकर बेहतरीन टिप्पणियाँ लिखते हुए एक विचारशील महिला होने का उदाहरण प्रस्तुत किया है । जहाँ तक मुझे याद है, उनकी लेखन शैली की भी जमकर तारीफ़ हुई है । बस इतनी शिक़ायत अवश्य है कि ज़रा मूडी हैं, कारण चाहे जो हो । इच्छा हुई, तो टिप्पणी लिखी, नहीं हुई तो खुद अपने ब्लाँग पर लिखी गई टिप्पणियों का जवाब तक नहीं देतीं । इनकी ये निष्ठुरता खलती है । दूसरा, मुझे व्यक्तिगत रूप से जहाँ तक लगा, इन्होंने अपने ब्लाँग अवेटर का चुनाव सोचसमझ कर नहीं किया । खुद जागरण कहता है कि आपका अवेटर आपकी अपनी छवि का संवाहक होता है । अगर अनीता जी बाद में कहें कि ये खुद उनकी तस्वीर है, तो मुझे उनसे क्षमा मांगते देर नहीं लगेगी । लेकिन देखने में तो ऐसा ही है, जैसे किसी विदेशी साइट से लेकर लगा दिया गया हो । फ़िल्मों की किसी वैम्पायर जैसी तस्वीर । बहुत सी ब्लाँगर लड़कियाँ और महिलाएँ हैं, जो अपनी तस्वीर नहीं लगातीं, लेकिन उनके अवेटर का स्थान या तो खाली होता है, या फ़िर कोई दूसरी खुशनुमा तस्वीर लगी होती है, जिससे किसी की छवि पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता । यही सारा कुछ है, जिसने उनके व्यक्तित्व को खामखा विवादास्पद बनाकर रखा हुआ है, और हमारी स्थिति गाँव के उन लड़कों जैसी है, जो झुन्ड बनाकर अपने मोहल्ले में घूम रहे हाथी के पीछे होते हैं ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: nikhil

निखिल पाण्डेय जी, आपका बहुत - बहुत धन्यबाद, हमें हमारी जिम्मेदारियों का एहसास कराने का, प्रतियोगिता अब ख़तम हो चुकी है, किन्तु हमारी अग्निपरीक्षा तो अब शुरू हुई है, जिस विश्वास और स्नेह के साथ Jagranjunction और पाठकों, साथियों ने हमें अंतिम १० मैं जगह दिलवाई, हमें उनके विश्वाश पर खरा उतरना है ! इस अंतिम टीम मैं शायद सबसे बिगडैल खिलाड़ी मैं ही था, जिसने अपनी शैतानियों से आप सभी को परेशान किया, फिर भी आप सभी लोगों ने मेरी उन नादानियों को दिल से नहीं लगाया, फिर भी मुझे इस अंतिम १० मैं जगह दी गई, इसलिए मैं अब थोडा जिम्मेदार होने की कोशिश करूँगा ! तुमने जो हम सबका अहवान किया है, मित्र मैं उसकी कदर करता हूँ, और तुम्हें धन्यबाद देता हूँ, इस प्रकाश से एक बार फिर हमें गौरान्वित करने के लिए ! मेरा नया लेख " मन का मेल " तुम्हारे इस अहवाहन को समर्पित करता हूँ !

के द्वारा: allrounder

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

अदिति जी काम कई तरह के है ..मै किसी राष्ट्रीय संगठन या एन जी ओ को बनाने की बात नहीं कर रहा .वास्तव में सबसे आसान काम तो ये ही है की हम वैचारिक आदान प्रदान करते रहे ..पर एक गाव में मेरा जाना हुआ वहा मैंने देखा की डाक्टर्स की एक टीम गाव के लोगो का इलाज कर रही थी ...तो मैंने पूछ लिया की क्या ये कोई सरकारी कैंप है तो एक युवा डाक्टर ने कहा की नहीं हम कुछ दोस्त है जो मिलकर गावो में जाते है और कुछ समाज सेवा करते है.. लोगो को सामान्य दवाए... देना चेकअप करना इत्यादि काम करते है....ये मुझे बहुत अच्छा लगा.... मेरे कुछ मित्र है जो अध्यापक है वे भी ३-४ ही है पर सप्ताह में एक बार गाँव में जाते है और वहा के उन बच्चो को पढ़ाते है.... हमारे गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष रहे मिश्र जी है जिन्होंने कुछ समय आईएस की तयारी की पर चयन न होने पर एक गाँव में गरीबो के लिए एक स्कूल खोल दिया जिसमे मात्र ३० बच्चे पढ़ते है उनकी पहल से धीरे -धीरे गाँव वालो ने भी मदद की और बच्चो के लिए बुक्स, इत्यादि का इंतजाम करवाया और ये स्कूल चल रहा है... अदिति आपको एक बहुत ही शानदार घटना आपको बताता हु..... इलाहबाद में काफी पहले एक अरविन्द जी रहते थे जो अपने मित्रो के साथ तयारी करते थे... एक अचानक क्या उनके दिमाग में आया की वे हिमालय तपस्या करने चले गए ... ठण्ड के दिनों में वे हरिद्वार आये कुछ गर्म कपडे खरीदने ... वहा जहा कुम्भ लगता है वही एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे उन्होंने देखा की वहा कुछ कुष्ठ रोगी और उनके बच्चे भीख मांग रहे थे .. हमारे समाज में एक बुरी है की कुष्ठ रोगियों को और उनके बच्चो तक को समाज से दूर कर दिया जाता है जबकि कोढ़ छूत की बीमारी नहीं है .... उन्होंने अचानक सोचा की तपस्या करने से अच्छा है की इनकी सेवा करू.... और उन्होंने वहा एक टिन की छत डाल कर उन कोढियो की सेवा शुरू कर दी उनके घाव की सफाई..उनके बच्चो को पढाना..इत्यादि सामान्य काम जो वो बिना ज्यादा धन खर्च किये कर सकते थे.... फिर उनके मित्रो को पता चला की वे क्या कार्य कर रहे है ..तो कुछ ने उनसे संपर्क किया और हर तरह से मदद की ...आज वे कुष्ठ रोगियों के लिए एक अस्पताल ..स्कूल, एक गौशाला एक होस्टल चला रहे है और उसकी पूरी व्यवस्था कुछ तो दान से और अधिकांशतः कुष्ठ रोगियों के श्रमदान और हस्त निर्मित वस्तुओ की बिक्री से चलती है ... इसमें काफी समय लगा अदिति जी लगभग २० वर्ष .. पर आज उनके कर्मो से ३०० से ज्यादा बच्चे और २०० कुष्ठ रोगी आत्मसम्मान के साथ जीवन बिता रहे है... ये बड़ी चीज है वास्तव में शुरुआत करने में झिझक होती है हमने स्वयं एक गाँव में काम करने से शुरुआत की ..लगभग २० लोगो का ग्रुप बना सब निर्धारित हो गया जब काम शुरू करने का दिन आया १५ लोग गायब हो गए ..अपनी लम्बी मित्र मंडली में मैंने ये प्रस्ताव रखा तो सभी ने कहा की क्या पागल हो गए हो....? तो भी हमने हर नहीं मानी ५ लोग ने गाँव निर्धारित किया ....और प्रक्रिया शुरू कर दी ...जरुरत भारत के सभी कोनो में है ... और लोग कर रहे है ... दिल्ली कुछ दिन रहा मै वह ये भी जाना की लोग नक्सल प्रभावित इलाको में भी काम कर रहे है ..६०-७० साल के बुजुर्ग लोग आराम नहीं करते सप्ताह में एक दिन किसी गाँव में या कालोनी में चर्चा करते है और मिलजुलकर जो समस्या सुलझने वाली होती है उसे सुलझा लेते है ....सरकार या प्रशासन का रास्ता नहीं देखते... मध्य प्रदेश के एक गाँव का उदाहरण मै बताऊ आपको वह के गाँव वालो ने अकेले दम पर नहर बना दी ... सरकारी मदद का रास्ता देखते देखते थक गए.... ऐसे बहुत उदाहरण है और हमें सोचना होगा की हम अपने आस पास में कैसे काम कर के देश की दशा में सुधार ला सकते है ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

सीमा जी आपकी प्रतिक्रिया ने मेरे लेख को सार्थक कर दिया है बहुत बहुत आभार ... एक महत्वपूर्ण बात खेद के साथ कहना चाहता हु की जिस योगदान को आपने नगण्य कह दिया है वास्तव में वही सबसे महत्वपूर्ण है ....ये छोटे छोटे योगदान ही सबसे ज्यादा प्रभावी भूमिका निभाते है क्योकि इनके आधार पर ही मजबूत नीव पड़ती है ये छोटे योगदान दीखते नहीं मीडिया में प्रचार नहीं पते पर वास्तव में ये ही सबसे महतवपूर्ण भूमिका निभाते है जिनका सबसे शानदार प्रयोग गाँधी जी ने किया... रचनात्मक कार्यो के रूप में जो गाँधी आन्दोलनों की सबसे अनोखी विशेषता थी...आप इन्हें नगण्य न समझे... ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई की आप साहित्य से जुडी है ...और वह भी बाल साहित्य से तो जाहिर है आपकी जिम्मेदारी और आपका ये नगण्य योगदान बहुत महत्व रखता है ...क्योकि आपको नीव की मजबूती पर काम करना है और हम जैसो को नीव का पत्थर बन जाना होगा ..पर यकीं मानिये जीवन सार्थक हो जायेगा अगर हमने २-४ को भी बदलने में सफलता पाई..तो , आपके जवाब से बहुत अच्छा लगा..... और एक शब्द में कहू तो अपने हिस्से की इमानदारी रख कर भी हम ये काम कर सकते है... बस ये ध्यान रखे की परिवार , समाज और राष्ट्र के प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारिय है ...और सबसे आसान चीज मै अदिति जी से कहूँगा की अगर रस्ते पर चलते हुए एक काटा हटा दे, बेवजह कही जलती हुई बत्ती बुझा दे, तो भी हम योगदान कर सकते है....ये बहुत छोटी बाते मैंने बताई है... जिन्हें हम ध्यान नहीं देते ..और अंत में यही कहूँगा...... SMAAL THINGS MAKES THE COMPLEMENT, BUT COMPLEMENT IS NOT A SMAAL THING,........ धन्यवाद

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल जी आपका लेख बहुत अच्छा लगा और सोचने पर मजबूर भी करता है । मैं साहित्य से जुडी हूं विशेषकर बाल-साहित्य से तो बात भी उसी शैली में करुंगी । आपने क्योंकि एक प्रश्न पूछा है कि हम किस तरह अपना योगदान दे सकते हैं तो मैं कहना चाहुंगी कि ईश्वर नें सबको कोई न कोई क्रिएटिव पावर दे रखी है , आवश्यक्ता है उसको पह्चानने की और आपनी-अपनी बौद्धिक / शारीरिक क्षमता के अनुसार हर इंसान योगदान दे सकता है । सच कहुं तो हमारा अपना योगदान नगण्य है लेकिन प्रयास जारी है , किस दिशा में .....?यह फ़िर कभी....... अदिती जी मुझे इस मंच पर शायद आपकी किसी बात का जवाब देने का अधिकार नहीं है वो भी जब बात मुझसे जुडी न हो , फ़िर भी क्षमा के साथ इतना कहुंगी कि कुछ करने का इरादा हो तो देश - काल की सीमाएं भी बाधा नहीं बन सकती , बस उसके लिए इरादा नेक और लगन सच्ची होनी चाहिए ,कोई न कोई रास्ता मिल ही जाता है । सीमा सचदेव

के द्वारा: seemasachdev

अदिति जी ..बहुत ख़ुशी हुई की आपने ये लम्बा लेख पढ़ा और वह प्रश्न पूछा जिसकी मै सबसे ज्यादा उम्मीद कर रहा था. जबसे मै जागरण मंच पर आया तबसे काफी कुछ पढने लिखने और जानने को मिला, पर लगभग हर मंच पर समस्यायों को उठाने उनके समाधान बताने के लिए लम्बी चौड़ी चर्चाये उपदेश इत्यादि देखा. मैंने खुद सोचा की मै खुद कौन सी भूमिका निभाऊ क्योकि उपदेश देने से समस्याए समाप्त नहीं होंगे न सरकार और न ही कोई संस्था या राजनितिक दल ही काम करेगा ...मैंने कई जगह अपने प्रवास में ये देखा की लोग मिलकर या अपने अपने स्तर से कई तरह के सकारात्मक काम कर रहे है और किसी को पता भी नहीं चल रहा है ....मेरे विचारो से कोई बदले या नहीं बदले मै खुद ही बदल गया ...इस्पे और चर्चा होगी पर मै चाहता हु की आप ही कुछ ऐसे काम सुझाये जो हम कर सकते है ... आसानी से ...क्योकि हर कोई आगे आकर काम नहीं कर सकता .. और ये लेख मैंने इसी उद्देश्य से लिखा है ताकि और भी लोग अपने कुछ सुझाव , या अपने कार्यो का विवरण दे ताकि उनसे अन्य लोग प्रेरणा ले सके... वैसे अभी आपसे यही कहूँगा की हमने कुछ सक्रिय होने की शुरुआत की है इसपर मै विस्तार से बताऊंगा पर अभी मुझे इंतजार है और सुझाव का की हम अकेले क्या कर सकते है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: rajkamal

मिश्र जी और मनोज जी ,, दिक्कत ये है की हम बच्चो पर जान बुझकर ये बोझ क्यों डाल रहे है आखिर सरकार ऐसे अन्धो की तरह व्यवहार क्यों कर रही है ? मै कक्षा ८ तक के बच्चो की बात कर रहा हु....१२-१५ वर्ष के इन मासूम बच्चो की त्वचा बेहद कोमल होती है ..और इतनी जलती हुई धुप में जब हमारे लिए बहार निकलना मुश्किल हो जाता है तो ऐसे में बच्चो के लिए कितना बुरा और खतरनाक है ये व्यवस्था... जिनके पास a/c गाड़िया है वे तो आकर ले जाते है ... पर जो बच्चे पैदल या साइकिल से आते जाते है उनके लिए बहुत ख़राब स्थिति हो जाती है .. मैंने जब एक अध्यापिका से पूछा तो वे कहने लगी की बच्चो को पहले से पढाया जाता है ताकि कोर्स पूरा किया जा सके.... अब सवाल ये उठता है की क्या सरकार की शिक्षा निति ये तय नहीं कर प् रही है की किस स्तर के बच्चो को कितना कोर्स दिया जाना चाहिए ? ताकि वे अपने नियत समय में पूरा कर ले. मुझे कही भी इस व्यवस्था का सही उत्तर नहीं मिला... क्या प्रशासन के लोगो को टिन के गर्म रिक्शो में दोपहर में १-२ बजे चिलचिलाती धुप में जाते हुए बच्चे नहीं दीखते है ? रोज अखबारों में खबर रहती है की अमूक स्कूल में बच्चे -बच्चिया धुप में बीमार पड़े... क्या यही तरीका है? आप उन्हें पढ़ने के नाम पर उनके स्वस्थ और बचपन से खिलवाड़ कर रहे है ? आसमान छूती बच्चो की फीस और अभिभावकों के साथ बच्चो का मानसिक शोषण करने वाली ये शिक्षा व्यवस्था कौन सा लक्ष्य पाना चाहती है ये तो वही बखूबी जानती है . मिश्र जी आपने बहुत सही बात कही है शिक्षा के अधिकार का नाटक एक तरफ खेला जा रहा है तो दूसरी तरफ आसमान छूटे शैक्षणिक खर्च ने अभिभावकों का मानसिक और आर्थिक शोषण कर रखा है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

सर प्रणाम , आपकी बात सही है.... समस्या मानसिकता की ही है .. पर दूसरा पहलु ये भी है की इतने विरोधो और ढुलमुल रवैये के बाद भी हिंदी की गति थमी नहीं है...और ये सतत प्रयत्नशील है अपने पद को पाने के लिए ... हमें शिक्षित वर्ग को जागरूक करना होगा .. जागरण के इस मंच को ही ले लीजिये .... इसे हिंदी में सोशल नेटवर्क के रूप में प्रचारित किया गया है ... और प्रतिदिन सैकड़ो लेख इस्पे हिंदी भाषा में आ रहे है ये अच्छा है हिंदी के प्रचार के लिए .... इस्पे कुछ जागरण के लोग भी ऐसे है जो अंग्रेजी में लिखने लगते है वे भूल जाते है की इससे उनके इस प्रयास में ही रुकावट पैदा होती है ...पर कौन समझाए....लेकिन कोई बात नहीं ...... आने वाला समय हिंदी के पक्ष में करने के लिए राष्ट्रवादी तत्त्व जरुर प्रयास करेंगे ऐसा मेरा विशवास है ..... जागरण पे हम लोग है ही .. जहा सक्रिय प्रयास करने की आवश्यकता होगी की जाएगी ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

मनोज जी सबसे पहले तो आपको धन्यवाद ... उत्साहवर्धन के लिए .. समस्या हमारी मानसिकता है ..हम साम्राज्यवादी बन्धनों से अभी तक आजाद नहीं हुए बल्कि एक नए प्रकार के साम्राज्यवाद में घिरते जा रहे है ...जो की आर्थिक साम्राज्यवाद है . और इसका हथियार इस बार भी वही मैकाले का बनाया हुआ वर्ग है जो रक्त से भारतीय है मगर उसकी भाषा ,भूषा ,भोजन व्यवहार सबकुछ आयातित है... इसलिए वह वर्ग किसी तरह की राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए सक्रियता दिखायेगा ये सोचना ही बेमानी है ...हिंदी राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है , इसलिए हमें ही पहल करनी होगी .. क्योकि ये ही वह डोर है जो भारत को बंधे रख सकती है इसे मजबूत करने की jarurat है , मैकाले की संताने इसका विरोध ही करेंगी .....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: subhash

अरुणेश जी और विभा जी आप दोनों का बहुत बहुत धन्यवाद ,विभा जी आपको विशेष रूप से क्योकि आपने इस कहानी में अमूल्य सहयोग दिया है.....विभा जी युगों का सफ़र है मई अकेले पूरी कहानी नहीं कह सकता ...तभी तो जागरण का सहारा लिया है ताकि .... हम सभी मिलकर इस कहानी को पूरा कर सके... जैसे आपने कुछ चीजे जोड़ी ..है वैसे ही जुड़ते जुड़ते ये कहानी पूरी हो जाएगी ऐसा विशवास है ...सहयोग के लिए धन्यवाद ....मुझे लगता है की हममरे मिलकर किये गए प्रयास से जागरण के पाठको को हिंदी के बारे में अच्छी जानकारी मिलेगी .... कोई सुझाव हो तो जरुर दे.... पर ये तय है की कहानी मै अकेले पूरी नहीं कर सकता .......आपसे सहयोग की आशा रहेगी................. धन्यवाद

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

निखिल ji, hindi की आत्मकथा लिख रहे हैं, बड़ा रोचक kaarya कर रहे हैं, इसके लिए badhai के पात्र हैं आप. संस्कृत, पाली प्राकृत, अपभ्रंश or फिर avhatt यानी purani हिंदी से गुज़रती हुई खड़ी बोली ne कई युग देखे हैं, aadikaal में ही अमीर खुसरो ne उसे वो खूबसूरत baangi दी थी, जिसे 1800 में फोर्ट विलियम kaulej के prayaason से भी nahi पाया जा सका. हिंदी apni कछुआ चाल से nirantar चलती रही, uske पास उसकी अपनी sagi बहनों अवधी, मैथिली आदि के सामान samriddh साहित्य भी nahi था, पर फिर भी उसमे kuchh तो था की मुग़ल उसके साथ फ़ारसी के shabdon को प्रचलित करते रहे, faltah उर्दू का जन्म हुआ, और अँगरेज़ उसके maadhyam से अपने dharm का प्रचार करते रहे, और आधुनिक काल में तो पत्र पत्रिकाएं विशेषकर उसी के sahaare समाज को आंदोलित करती krahin. हिंदी पर achchhi bahas भी chali raaja shiv prasaad sitare hind, lakshman singh और bheemsen की हिंदी के prati khaas aagrah unki shailiyon में jhalakta hai, वो sb भी km रोचक nahi hai, madhya desh की bhasha kaisee bhaarat varsh की raani ban gai thoda is पर भी likhen तो aatm katha adhik praamaanik hogi, jaldi jaldi mt bhaagiye, vistaar से bataiye, varna bahut kuchh chhoot jaayega....

के द्वारा: vibha

Main aapse sahmat hoon aur inhi issues se vichlit ho jata hoon par people around us do not undrstand all this. They are not able to judge the prospective harm bcoz koi bhi prachar tantra in sab cheezon ke negative points highlight nahin karta hai. Dekha jaaye to kusoor nayi generation ka nahin hai kyunki unko keval yahi bataya ja raha hai ki ye sab jo hai wo sahi hai- "This is In". Jab Baazar ya phir kahen ki society mein keval ek hi tarah ka trend available hoga to logon ko use choose karne ke alaawa koi aur option nahin hoga. Jab koi 'Moolya' hain hi nahi samne follow karne ke liye to nayi generation analyze (compare) kise karegi. Just have a look at the kind of programs that MTV, Bindaas and others are broadcasting. They are the self proclaimed channels for YOUTH. I just want to ask What is meant by MODERNISATION? Does it mean adopting new innovations of science and technology to improve the life of mankind or does it mean adopting all those practices that lead the mankind towards negative social and moral values. If social and moral values were not essential then why had our ancestores (of all religions) established them in the society. Human always has some hidden lusts inside him. Rules and regulations of the society keep human from being overpowered by those lusts otherwise human will also act like an animal. But those lusts always tempt the human. These modern business companies target that very hidden lust of human to sell their products. They use to justify that lust as a positive thing and term the expression of these lusts as Freedom or Independence. Hamare samaaj ko is cheez ka bodh kaise karaya ja sakta hai?

के द्वारा: Nitin

के द्वारा: Ram Kumar Pandey

के द्वारा: nikhil pandey

के द्वारा: Gopalji

इस बार काफी समय बाद आपने नई पोस्ट डाली. वैसे बढ़िया इश्यू है यह, और काफी गंभीर भी. वस्तुतः प्रश्न केवल शिक्षकों की लापरवाही का नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का है. जिस देश में गैर अनुशासनात्मक अभिवृत्तियों का वर्चस्व हो और हर किसी के मस्तिष्क में अधिकाधिक स्वातंत्र्य को भोगने की लिप्सा तो ऐसे में कर्तव्य निर्वहन की आकांक्षा स्वप्न के समान ही है. बहुत लिबरल हो गए हैं हम और विनाश को निमंत्रण दे रहे हैं. कुल मिलाकर एक प्रकार की अराजकता है यह. इसका एक तात्कालिक और प्रभावी उपाय सिर्फ वास्तविक राष्ट्रवाद की स्थापना है जिससे हर कोई अपने जिम्मेदारियों के प्रति सतर्क हो सके.

के द्वारा: Ram Kumar Pandey

के द्वारा: ravi kumar guru




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