सर झुकाकर आसमा को देखिये ...........

राष्ट्रवादी,राजनीतिक,सामाजिक चर्चा,विचार मंथन

55 Posts

1031 comments

NIKHIL PANDEY


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

हुसैन की मौत-राष्ट्रीय क्षति या राष्ट्रीय मुक्ति?

Posted On: 11 Jun, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (18 votes, average: 4.56 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

33 Comments

सज्जन शक्तियों से आह्वान-’के.एन.गोविन्दाचार्य’

Posted On: 8 May, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

4 Comments

कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है

Posted On: 5 Mar, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

74 Comments

दिखावे का भी दोष है ….

Posted On: 3 Mar, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 4.67 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

41 Comments

तू ही मन मीत है-“Valentine Contest”

Posted On: 14 Feb, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

24 Comments

“धारा के विरुद्ध चले,धारा की दिशा बदल दी-Valentine Contest”

Posted On: 14 Feb, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

24 Comments

Page 1 of 612345»...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय शशिभूषण जी अभिवादन स्वीकार करे ... आप सभी वरिष्ठ महानुभाव शायद मेरी बात को समझ नहीं प् रहे ... बात व्यवस्था परिवर्तन की हो रही है .. और व्यवस्था परिवर्तन व्यवस्था का अंग बनकर नहीं हो सकता .. राजनीतिक कदम के विरुद्ध मै इसलिए नहीं हु की अरविन्द जी की नियत पर संदेह है बल्कि इसलिए हु की अभी वे आन्दोलन से जो हवा बनी उसी हवा पर कदम रखकर अपने लक्ष्य निर्धारित कर रहे है ..अन्ना जमीं की लड़ी चाहते थे ताकि पुरे देश में पहले एक आधार तो बन जाये ..फिर अगला कदम उठाया जायेगा ... पर जल्दबाजी में अरविन्द जी ने अन्ना की ताकत और उनकी अपील का फायदा नहीं उठाया ... वे ये भूल गए की अन्ना तो आजके गाँधी बन गए (मेरा ये मत नहीं है ) पर अरविन्द नेहरु नहीं है उनकी अपील मीडिया के भरोसे पर है ..और मीडिया किसी का सगा नहीं है ये सभी जानते है .. राजनीती में आकर दो-चार सीटों को प्रभावित करके अरविन्द जी का कोई फायदा नहीं होगा पर आप जिस प्रचंड आग की कल्पना कर रहे है वह बुझ जाएगी ... मै विनम्रता से कहना चाहता हु की आशंकाए अवसाद को जन्म नहीं देती .. अवसाद हमेशा भ्रम के गर्भ से जन्म लेता है ..भ्रमपूर्ण आशंकाए नुकसानदायक होती है पर आशंकाए अक्सर हमें सचेत भी करती है ... और भ्रम ये है की हम इन साप बिच्छुओ से हो रही कुश्ती को देखकर हर्ष व्यक्त कर रहे है ...जरुरत थी करोणों अरविन्द और अन्ना जैसी लाठिया बनाने की जो करोणों साप बिच्छुओ अजगरो से एक साथ लड़ सके कीड़े मकोडो से लड़ने में समय ताकत व्यर्थ करना मुझे समझ में नहीं आता ....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

सर आपको आज़ादी से लेकर अभी तक हुए सभी आंदोलनों के विषय में अनुभव है यह मै मानता हु .. और आप इस आन्दोलन की तुलना मेरठ के आन्दोलन से नहीं कर सकते .. जन भागेदारी के हिसाब से जे. पी. के आन्दोलन के बाद यह सबसे बड़ा आन्दोलन बन्ने की तरफ अग्रसर था....जिस तरह से आन्दोलन हुए उस तरह से दृश्य जो सामने आया वह न तो कला धन का था , न लोकपाल का ही रह गया .. न अन्ना.. न रामदेव न कांग्रेस की ही लडाई रही थी बल्कि देश में जहा जहा तक अन्ना और रामदेव का नाम पंहुचा आम जनता ने उन्हें अपने लिए एक तारनहार समझ लिया और उन्हें जितनी ताकत दी उतनी ही अपेक्षा की ... मै इसी ताकत को बढ़ने की बात कर रहा था ..आप देश में सालो से हो रहे स्थानीय धरनों से इसकी तुलना नहीं कर सकते... इसमें जनता सीधे सहभागी बनना चाहती थी ..इस अपेक्षा से जिम्मेदारिय जितनी बढ़ जाती है ..खतरे और भटकाव की स्थिति भी बनती जाती है .. कुछ ऐसा ही है जनता एक और नया राजनितिक दल नहीं चाहती जो फिर से करोणपतियों के द्वारा चुनाव लड़े बल्कि वो पूरी व्यवस्था में परिवर्तन चाहती है जिसकी उम्मीद अन्ना और अरविन्द ने जगाई थी .. तो ऐसे में जबकि जनजागरण को शक्ति के रूप में बदलने का महत्वपूर्ण काम जो अधुरा था उसे पीछे धकेल कर अधूरी ताकत के साथ राजनीतिक दल बनाकर की जा रही ये लडाई सारे किये कराये पर पानी न फेर दे.... रही बात आन्दोलन से उम्मीद की तो अगर हम किसी को नेता मानकर उसके उद्देश्य और तरीके से प्रभावित होकर अगर सड़को पर सारे काम काज छोड़ कर सडको पर उतर रहे है तो उम्मीद भी तो उसी हिसाब से करेंगे और ऐसे में अगर वह नेता अपने पथ को मोड़ देता है तो विरोध तो होगा ही ..

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीय निखिल जी, सादर ! बहुत विश्लेषणात्मक रचना ! अगर हम यह मानकर चलें की श्री केजरीवाल सत्ता के लोभी हैं, तो फिर उनके इस अभियान का कोई भी अर्थ निकाला जा सकता है, पर अगर यह मान लें की वे निश्छल रूप से राजनितिक परिवर्तन चाहते हैं तो इस अभियान का वह अर्थ कदापि नहीं रह जाएगा जो आप कह रहे हैं ! आप की तरह देश की जनता भी आशंकाओं से ग्रस्त है ! आशंकाएं अवसाद देती हैं, उत्साह नहीं ! श्री केजरीवाल ने जो आग जलाई है, उस आग ने प्रारम्भावस्था में ही अनेक सांप-बिच्छुओं को विचलित कर दिया है ! अभी तो इस आग का प्रचंड रूप बाकी है ! समय जब करवट बदलता है तो पलक झपकते परिस्थितियाँ बदल जाती हैं ! रचना के साप्ताहिक सम्मान प्राप्ति पर मेरी हार्दिक बधाई !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरणीय वंदना जी यही बात मै कहना चाहता हु की केजरीवाल जी ने जनमत बनाया ही नहीं वे सतही आवेग को जनमत मान बैठे और घर में बैठ कर एस एम् एस करने वालो को अपना समर्थक मान लिया ..वे ये भूल गए की 10 करोण एस एम् एस करने वालो के लिए मोबाईल से एक की जगह २० मेसेज ..भेजना आसन है पर इन्हें सड़क पर उतार का एक आन्दोलन बना देना मुश्किल है .. जिसे हम आन्दोलन कह रहे है वह केवल एक विरोध था ..आन्दोलन तो अभी बनाना था ये बात अन्ना समझते थे तभी उन्होंने ये कहा की मोबाइल के एस एम् एस को वे जनसमर्थन नहीं मानते .. आप जी विकल्प की बात कर रही है तो ऐसे विकल्पों के लिए केजरीवाल जी से बड़ी लडाईया गाँधी ,जे.पी. लोहिया ..ने लड़ी .. और एक से बढ़कर एक विकल्प दिए वो भी तब जब आन्दोलनों को व्यापक बनाने के लिए मिडिया भी ऐसी सशक्त नहीं थी ..समाजवादी राष्ट्र की स्थापना का विकल्प और ..अंतिम व्यक्ति की सत्ता का विकल्प .. और हुआ क्या वो तो आज हम देख रहे है .. कारण ये है की रजनीतिक सत्ता का विकल्प दूसरी राजनितिक सत्ता नहीं हो सकती ..बल्कि शशक्त जनमत होता है …और जनमत बना नहीं था इसलिए जे. पी सभी चेले आज के सबसे बड़े सामंत बनकर राजयोग का भोग कर रहे है… वंदना जी कामन मैन केजरीवाल जी के साथ न था न है …क्योकि कॉमन मैन न लोकपाल समझता है न राष्ट्रमंडल न २ जी ..हा मीडिया के शोर में उसने अपने जैसे एक कॉमन मैंने कि झलक अन्ना में देखी जिसके लिए वो आगे आया … इसी को केजरीवाल जी ने समर्थन मान लिया ..अभी तो आन्दोलन खड़ा करना था इसपर और चर्चा और मंथन की आवश्यकता है .. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .............

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीय वंदना जी यही बात मै कहना चाहता हु की केजरीवाल जी ने जनमत बनाया ही नहीं वे सतही आवेग को जनमत मान बैठे और घर में बैठ कर एस एम् एस करने वालो को अपना समर्थक मान लिया ..वे ये भूल गए की 10 करोण एस एम् एस करने वालो के लिए मोबाईल से एक की जगह २० मेसेज ..भेजना आसन है पर इन्हें सड़क पर उतार का एक आन्दोलन बना देना मुश्किल है .. जिसे हम आन्दोलन कह रहे है वह केवल एक विरोध था ..आन्दोलन तो अभी बनाना था ये बात अन्ना समझते थे तभी उन्होंने ये कहा की मोबाइल के एस एम् एस को वे जनसमर्थन नहीं मानते .. आप जी विकल्प की बात कर रही है तो ऐसे विकल्पों के लिए केजरीवाल जी से बड़ी लडाईया गाँधी ,जे.पी. लोहिया ..ने लड़ी .. और एक से बढ़कर एक विकल्प दिए वो भी तब जब आन्दोलनों को व्यापक बनाने के लिए मिडिया भी ऐसी सशक्त नहीं थी ..समाजवादी राष्ट्र की स्थापना का विकल्प और ..अंतिम व्यक्ति की सत्ता का विकल्प .. और हुआ क्या वो तो आज हम देख रहे है .. कारण ये है की रजनीतिक सत्ता का विकल्प दूसरी राजनितिक सत्ता नहीं हो सकती ..बल्कि शशक्त जनमत होता है ...और जनमत बना नहीं था इसलिए जे. पी सभी चेले आज के सबसे बड़े सामंत बनकर राजयोग का भोग कर रहे है... वंदना जी कामन मैन केजरीवाल जी के साथ न था न है ...क्योकि कॉमन मैन न लोकपाल समझता है न राष्ट्रमंडल न २ जी ..हा मीडिया के शोर में उसने अपने जैसे एक कॉमन मैंने कि झलक अन्ना में देखी जिसके लिए वो आगे आया ... इसी को केजरीवाल जी ने समर्थन मान लिया ..अभी तो आन्दोलन खड़ा करना था इसपर और चर्चा और मंथन की आवश्यकता है .. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी,सर्व प्रथम बेस्ट ब्लोगेर ऑफ़ द वीक की बधाई स्वीकार करें मैं आपके इस विचार का समर्थन नहीं कर सकता की अरविन्द केजरीवाल ने गलत राह पकड़ ली है.जिस प्रकार से सरकार ने अन्ना के आन्दोलन को उपेक्षित कर दिया था .कोई भी पार्टी उनके जनलोक्पल पास करने के लिए संकल्प बद्ध नहीं दिखाई दे रही थी.सब कुछ ऐसे लगने लगा था जी भैंस के आगे बीन बजायी जा रही है .नेताओं को कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. अतः एक ही विकल्प रह गया था एक पार्टी बना कर इमानदार सांसदों को संसद में पहुंचा कर व्यवस्था में परिवर्तन लाने के प्रयास किये जाएँ .यह तो निश्चित है की यह मार्ग आसान भी नहीं है.परन्तु हमें निराश नहीं होना चाहिए .बल्कि अरविन्द केजरीवाल के हाथ मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए.

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा:

के द्वारा: ashwanikumar ashwanikumar

आदरणीय बड़े भैया नित्य दिनों का प्रणाम आपका आज का लेख निश्चय ही एक गंभीर प्रश्न की ओर इंगित करता है जो देश की अश्मिता से सम्बंधित है निश्चित ही एक सच्चा हिन्दुस्तानी किसी की कला की प्रशंसा देश की कीमत पर नहीं कर सकता , बड़े पद पर आसीन कोई व्यक्ति ही क्यों न हो.. यदि ऐसा है तो वह अपने भारतीय होने के गौरव पर प्रश्नचिंह लगा रहा है और इस परिवेश में ये कदापि स्वीकार नहीं हो सकता............ भारत सर्वधर्म समभाव का देश जरुर है परन्तु अपने भारतीयता के धर्म से कदापि अलग नहीं , वरन ये ऐसी विभिन्न धर्मो की शरणस्थली है इसका ये मतलब नहीं की कही से आया कोई मानसिक उत्कंठा से भरा मकबूल फ़िदा हुसैन सरीखा व्यक्ति अपनी अमर्यादित कला का घिनौना प्रदर्शन करके प्रशंसा का पात्र बन जाये और देश का नेतृत्व कर रहे विचारहीन कुत्सित राजनेता उसे राष्ट्र के गौरव का मान दे ....... राष्ट्र की गरिमा का विश्व पटल पर जो माखौल बना रहे प्रतिनिधित्व करने वाले तुगलक सरीखे प्रधानमंत्री को देश का आम देशभक्त बर्दास्त नहीं करने वाला. और अंत में आपसे उस आम देश्बक्त के तौर पर कहना चाहूँगा की ये राष्ट्रीय मुक्ति है उस कलंक से जो एक कुत्सित कला के व्यक्ति ने लगे थी............ वन्देमातरम.....जय हिंद, हिंदी, हिंदुस्तान

के द्वारा:

भाई सर्वप्रथम आपको इस लेख के लिए धन्यवाद जो आपने सब तक ये सन्देश ओउर जानकारी पहुचई हम तो बस यही कहेंगे हुसैन की मौत देश की मुक्ति ही इतने पापी इंसान से जिसने करोडो भारतीयों को लज्जित करने का नारकीय कार्य किया हो जिसे माता का स्थान दिए गया हो उसे नग्न फोटो पर बनाना क्या है शायद वो किसी माता की नहीं जानवर की ओउलाद था तभी तो माता क्या होती है जान न सका नहीं तो शायद ये करते समय उसकी रूह कांप जाती जन्हा तक आपने प्रधानमंत्री जी की बात की अब हम आप किसी (*********************) ऐसे इसान के बारे में क्या कह सकते है जो खुद शायद आपनी मर्जी से छीक भी नहीं सकता तो वो बेचारा तो वही बलेगा जो बोलने को कहा जायेगा नहीं तो वोट बैंक खराब हो जायेगा न हाँ अगर बाबा रामदेव पर लड़ी चलने की बात हो तो आदेश तुरंत आजाता है ओउर क्या कहे

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

आदरणीय बड़े भैया सादर प्रणाम नित्य दिनों की भांति आज भी आपका लेख पढ़ा जो निश्चित ही वर्तमान लोकतंत्र के काले अध्याय का सारगर्भित संकलन है , इस प्रकार के कायरतापूर्ण कार्य पर भी यदि चेतना नहीं जागृत हो तो यह नितांत कष्टकारी होने वाला है आने वाले दिनों में ................. आज सत्याग्रह का दमन एक और परतंत्रता की ओर अग्रसरित है.......... और अबकी लड़ाई भयावह इसलिए होगी क्योकि आज गाँधी , सुभाष, भगत नहीं मिलने वाले हाँ सिब्बल जैसे डायर दिग्विजय जैसे डगलस की भरमार है................. एक संघर्ष देश की आज़ादी के लिए थी और अब जरुरत है अपने हितो के लिए अपनी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना.......... वो भी ऐसे देश में जिस पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,

के द्वारा:

सारगर्भित लेख के लिए आपका आभार व्यक्त करते शुभकामना अपने बिलकुल वाजिब सवाल उठाया है कि भट्टा-परसौल में जहा किसानो के भेष में आपराधिक तत्यो ने जिन्होने सरकारी कर्मचारियो का अपहरद किया था और उन्हें मुक्त करने गए अधिकारिओ पर असलहो से हमला किया और उसमे जिलाधीश तक को गोली मरी गयी वह यह बहुरुपिया युवराज जिसकी निष्ठां तक संदिग्ध है कानून की धज्जिया उडाता पहुच कर अशांति पहुचने की नाकाम कोशिस की,और मात्र राजनितिक रोटिया सकने के लिए ७४ लोगो की हत्या तथा महिलाओ के साथ बलात्कार का झूठा,और फरेबी बयान ही नहीं दिया प्रधानमंत्री जो एकतरह से उसके घरेलु नौकर की तरह व्यवहार करते हुए उसकी लफ्फाजियो को इतना महत्व दिया और अपने अधिकारों का अतिक्रमद करते हुए सहायता राशी जारी की वह उनकी साम्राजवादी चाकरी का घ्रिदित उदाह्रद है. और आज जब सर्वोच्च न्यायालय तक इसे अलोक्तान्त्रन्रिक घोषित कर नोटिस जारी किया तो हमारे बंधक ध्रितराष्ट्र शिखंडी मनमोहन घटना को दुर्भाग्य्पुर्द लेकिन आवश्यक बताने और सम्राज्ञी तथा युवराज के आगे शिखंडी की भूमिका में फिर अवतरित हुए भट्टा-परसौल के किसानो की तो गलती थी कि उन लोगो ने कानून हाथ में लिया लेकिन शाहरुख़,सलमान को आदर्श मन उन्ही से प्रेरदा ले एक स्टंट कर विदुशाको की टोली में शामिल हो उत्तर प्रदेश को जीतने का ख्वाब कनिष्क सिंह के बेडरूम में देखते रहे यहाँ उनकी नाक के नीचे इतने बड़े पुलिसिया तांडव जिसमे कैमरों के सामने महिलाओ,बच्चो,वृधो पर अमानुषिक कार्यवाही को टी.वी.पर देखते हुए खिलखिला रहे थे माँ-बेटे विजय केक काटते और आन्दोलन की कुचलने की ख़ुशी मानते रहे. यह भारतीय खून नहीं हो सकता इन दोनों के अंदर विदेशी इटालियन जीवाणु है. इनके अंदर मानवीय मूल्यों का सर्वथा आभाव है इसका गुरु भी मध्य प्रदेश से खदेड़ा गया दिग्गी है जिसे तत्काल मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब यह लोगो को कटाने दौड़ेगा कि यह आर.एस.एस. का है हमें लगता है कि दिग्गी राजा की बचपन की कोई आर.एस.एस. से जुडी फूहड़ यादे है जो इसे चैन से रहने नहीं देती इसे हर मामले में वही कुछ-नकुछ बकने को विवश कराती रहती है. आखिर यहाँ हो क्या रहा है क्या किसी खास संप्रदाय का होने की वजह से इन अर्ध्विदेशी और अर्धैसी-अर्धाहिंदु खानदान और उसके वारिस के अतिरिक्त किसी को बोलने का अधिकार नहीं है आज से नहीं इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के विदेशी खातो को जेर्मनी तथा any samachar patro ने नंबर के साथ प्रकाशित किया है और उसका खण्डन भी इस परिवार द्वारा नहीं किया गया है ( सम्पुर्द जानकारी के लिए सुरेशचिपुलकर के महाजाल पर देखे सोनिया गाँधी को कितना जानते है देखे) शायद यही वजह है कि यह सरकार किसी कीमत पर काले धन के बारे में कुछ करना नहीं चाहती नहीं तो एक आम आदमी को भी ज्ञात है कि इस काले धन को वापस लेन से कितना फायदा देश को होगा लेकिन यहाँ तो काले धन की बात करने का मतलब सोनिया रूपी साढ़ को लाल कपडा दिखाना लगता है,इसी के वशीभूत काले धन के मुद्दे बाबा को पहले वी.वी.पी.आई. सम्मान दिया गया जो घूश के रूप में था लेकिन जब बाबा अड़े रहे कि काले धन को राष्ट्रिय संपत्ति घोषित किया जय तो बाबा और उनके साथ के पुरुषो,महिलाओ और बच्चो तक को तोड़ डाला गया. इनदोनो के पास नातो कोई दृष्टि है और नहीं इस देश की मिटटी से कोई मोह आपलोग भूले नहीं होगे जब १९७१ के युध्ध में इसने राजीव को छुट्टी लेने को बाध्य किया और शर्मनाक तरीके से पुरे देश में अकेला पायलेट रहा जो छुट्टी बिताने इटली की रह पकड ली कभी इटली के दूतावास में शरण ली. अबतक तो इनकी निष्ठां संदिग्ध्ध रही लेकिन इस लोमहर्षक घटना के बाद युवराज का अपने मम्मी के पल्लू में छिपने में ही अपनी भलाई समझी. यहाँ की जनता सीधी है नहीं तो इस बहुरूपिए को जूतों से पीटना चाहिए रहा सवाल दिग्गी का तो हम लगभग १५० लोगो ने अभियान चलाया है कि इसकी बाते पढ़े-लिखे लोग अपनी बात-चीत में इसका तिरस्कार करे यह उसी का पात्र है बुध्ध्जिवियो को इसके किसी बात का कोई नोटिस नहीं लेना चाहिए. मई कहा बहक गया बात आपके लेख की हो रही थी,जो बहुत प्रभावशाली तरीके से अपने रखा इसके लिए आपको को पुनह धन्यवाद इसी तरह के लेख लिख हम लोगो की भावनाओ को अभिव्यक्त करते रहे |

के द्वारा:

अलका जी मौलिक बात ये ही है सबके सामने आप के हित रामदेव से प्रभावित हो रहे थे .. पर वह जो लोग थे जो बहु बेटिया थी वे इस देश की आम जनता थे .स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक .. उनसे ऐसा बर्बर व्यवहार करना इतना शर्मनाक है की की हम कैसे कहे की यह एक आपातकाल जैसी स्थिति नहीं है ? सोनिया और राहुल को अगर शर्म नाम की चीज हो तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए ...महिलाओं के साथ इतना शर्मनाक व्यवहार करने वाली पुलिस और उन्हें आदेश देने वाले सिब्बल और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को लोकतांतत्रिक मूल्यों को कुचलने के आरोप में राष्ट्रद्रोह के लिए दी जाने वाली सजा देनी चाहिए .. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी......... बाबा का विरोध करने वाले कई लोगों की परेशानी यह है की आखिर कैसे कोई साधारण सा आदमी साइकिल से चर्टेट प्लेन तक पहुँच सकता है…… वो भी एक बड़े जन समर्थन के साथ…… कैसे एक साधारण भगवा धोती पहनने वाला कई कंपनियों का स्वामी हो सकता है….. कैसे कोई आदमी राख मे भी हाथ डाल कर वहाँ से भी सोना निकाल रहा है….. कैसे भगवा धारी एक आदमी अपने पीछे जनसैलाब जमा कर सरकार बदलने की क्षमता दिखा रहा है……. अगर आरएसएस भ्रष्ट है …… अगर बीजेपी भ्रष्ट है …… अगर बाबा रामदेव के पास काला धन है तो फिर क्यों सरकार काले धन के स्वामियों को मृत्युदंड देने की मांग से कतरा रही है॥ क्या काँग्रेस आरएसएस या बीजेपी या भ्रष्ट बाबा से मिली है……. जो उनको बचाने के लिए इस बिल को पास नहीं होने देना चाहती…….. क्यों लोकपाल सरकार के गले की हड्डी बना है……. जब तक आप जैसे लोग ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी…… और एक राष्ट्रहित के विषय पर आंदोलन करने वाले को ठग कहने वालों का समर्थन करेंगे………. तब तक भारत केवल शब्दों मे ही आज़ाद रहेगा…….. धरती की कसम अंबर की कसम, ये ताना बाना बदलेगा तू खुद को बदल तू खुद को बदल, तब तो ये जमाना बदलेगा

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

निखिल जी मुद्दा ये है की लोगों को मारा क्यूँ? आधी रात को सोये हुए लोगों को जिस बेरहमी से मारा गया उसका प्रतिकार क्या है? क्या वो जानवर थे? या उन्होंने कोई अपराध किया था? जिन मुद्दों को ले वो सामने गए थे, क्या उनका समाधान उनको दे दिया गया था? या आपके समाधान देने बाद भी वो वहीं पे डट गए थे? क्या उनको कोई टाइम दिया गया था वहां से हटने के लिए ? इतने संवेदन हीन हो गए थे की बच्चो बुजुर्गों औरतों को घेर घेर के जानवरों की तरह मारा पीता गया, और तो और इलाज भी नही दिया गया, अब युवराज कहाँ गए? अब शायद उनका माथा गर्व से ऊंचा हो गया होगा? आज सच में दिल रो रहा है, अपने ही देश में अपने ही लोगों के हाथो ये शर्मनाक खेल खेला गया. गुलामों से भी बदतर स्थिति. और लालू, सिब्बल, दिग्विजय और पुलिस के लोग कह रहे हैं की कुछ नही हुआ किसी को कोई चोट नही आई. धिक्कार है ऐसे लोगों पे और उनकी मानसिकता पे.

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी नमस्कार ,आपने बहुत ही अच्छा विषय(सभ्यता -संस्कृति का ) उठाया हैं. आज हमारी सभ्यता और संस्कृति विलुप्त होती जा रही हैं. फिर भी कुछ लोग हैं जो इसे बचा कर रख रहे हैं. मेरा तो यही मानना हैं की हम आधुनिकता की दौर में शामिल हो लेकिन अपनी सभ्यता संस्कृति को बचा कर.उस कॉलेज के छात्र -छात्राओ और प्रिंसिपल को मेरी और से हार्दिक बधाई. हमें अपनी सोच को आधुनिक रखना चाहिए न की आधुनिकता के नाम पर सभ्यता और संस्कृति को खतरे में डालना चाहिए. हा यहाँ यह बात कहना प्रांसगिक होगा की सभ्यता -संस्कृति के नाम पर कुरीतियों को बढ़ावा न दिया जाये. आपकी यह लाइन बिलकुल सटीक हैं "कुछ लोग : जो अपवाद को जन्म देते है" बढ़िया लेख .जय हिंद जय भारत नाम -अमित कुमार गुप्ता हाजीपुर वैशाली बिहार

के द्वारा:

आदरणीय अग्रज अभिवादन, इस तरह के अपवादों को जन्म देने वालों को नमन, किन्तु सिर्फ नमन karane से हमारा दायित्व ख़तम नहीं हो जाता, हमें मिलकर इन अपवादों को प्रचलन में लाना होगा.. जब ये प्रचलन में आ जायेंगे तभी इन अपवाद देने वाले लोगों के साहस का समुचित सम्मान हो सकेगा | वस्तुतः: अगर निष्पक्ष होकर मनन करें, तो हम पाते हैं कि हम आज भी कहीं न कहीं उन बेड़ियों को आभूषणों की तरह संजोकर रखे हैं | जो हमारी पारम्परिकता को चुनौती देती रहतीं हैं | ब्लैक गाउन भी उन्ही चुनिन्दा बेड़ियों में से है जिसे हम आभूषणों की तरह पहनते हैं | जब तक भारतावारी अपना सम्मान करना नहीं सीख पायेंगे तब तक, विश्व के अन्य देशों से अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, और मानव मूल्यों के सम्मान की सोचना कहीं न कहीं ..... अपूर्ण और असंगत लगाने लगती है | ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- अच्छे लेख के लिए बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

प्रिय निखिल जी अभिवादन, जैसे की आपने कहा था, वैसे ही मै भी कभी ब्लॉग प्रमोट नहीं करता. पर इस तरह के लेख और विचार तो मैं कहता हूँ कि आप न केवल प्रमोट कीजिये बल्कि हक़ से लोगों के मुंह पर दे मारिये. मैं तो खुद ही इस तरह के विचारों और संस्कृति का प्रबल समर्थक रहा हूँ और आप यदि मेरे पिछले लेखों पर जायेंगे तो देखेंगे कि मैंने हमेशा सरस्वती शिशु मंदिरों की शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी स्कूलों की शिक्षा पद्धति से ज्यादा बेहतर माना है. मेरी तो समझ में नहीं आता कि इस तरह की शुरुआत राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं होती. अभी पिछले वर्ष की ही बात है जब पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने एक दीक्षांत समारोह में अपना कन्वोकेशन गाउन अचानक उतार दिया था और इसे अंगरेजी बर्बरता का प्रतीक बताया था. हालांकि वो उनकी दिखावे की नौटंकी थी. पर ईमानदारी से इसकी पहल होनी ही चाहिए तभी हम अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा कर पायेंगे. डा. प्रदीप राव जी को मेरी 'हैट्स ऑफ' और आपको भी इस ब्लॉग के लिए बधाई.

के द्वारा: राजेंद्र भारद्वाज राजेंद्र भारद्वाज

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीय निखिल जी सादर अभिवादन ! दिखावा समाज में फ़ैली एक संक्रामक बिमारी है, और ये दिखावा आयोजन विशेष में ही न होकर जीवन के हर पल में लोगों के साथ साथ चलता हैं, उदाहरण के लिए लोग दिनक जीवन में प्रयोग की जाने वाली वस्तुएं, और सेवायें उपभोग में लाते हैं, जिनके साथ किसी अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी या किसी चर्चित व्यक्तित्व का नाम जुदा होता है | जबकि दूसरे उत्पादों जिनके उपभोग से पर्याप्त बचत की जा सकती है, जिनमे गुणात्मकता तो है, किन्तु विज्ञापन की मदों से कटौती के कारण सस्ते हैं | और आयोजनों के समय तो इनका क्या पूछना दिखावे के लिए पैसे और अन्य ( संसाधन ) बहा दिए जाते हैं ..... बढ़िया लेख बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

प्रेम की व्यापक प्रकृति पर सुन्दर लेख के साथ साथ प्रेम पूर्ण कविता मन को प्रसन्न कर गयी आपकी कविता बहुत ही अच्छी है आप बहुत अच्छी कवितायें लिखते हैं | कविता के भाव गति और लयात्मकता से सुखद अनुभूति होती है आभार --------------------------------------------------------------- इस भटकती नजर का ठिकाना बना , दिल तुम्हारा मेरा आशियाना बना . भूल बैठा हु सारे जहा को मै अब …… एक नजर का असर उम्र भर के लिए --------------------------------------------------- कोई राधा बनी ,कोई कान्हा हुआ , राम का दास तुलसी दीवाना हुआ . प्रेम है सारे जग में भरा देख लो, कोई तन्हा किधर उम्र भर के लिए ………. प्यार का है असर उम्र भर के लिए , ये सुहाना सफ़र उम्र भर के लिए ---------------------------------------------- बहुत सुन्दर लगीं

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

बहुत सुन्दर मैं तो हंसी रोक ही नहीं पा रहा हूँ ..... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- अरे यार क्या लिखू सब तो इन लोगो ने लिख ही दिया है अब कांटेस्ट बीत जायगा तब लिखूंगा और अगर शादी नहीं हुई होती तो कुछ लिखने को भी होता …. --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- क्योकि आखिर प्रेम तो हमने भी किया है हम तो बचपन से ही प्रेमी रहे ..याद नहीं कितने दफा सिंगल हुए कितने दफा कमिटेड .. .. हर 3 महीने पर आर्कुट पर स्टेटस बदलना पड़ता था ,, जबतक मैरेड नहीं हो गए... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------- विशेष ————— पार्को ,सिनेमाहालो इत्यादि सार्वजनिक स्थलों को बख्श दे .. आपके क्रियाकलाप बच्चो पर बुरा प्रभाव डाल सकते है .ये जीवन के बहुमूल्य 7 दिन है. आपने बहुत स्वस्थ मनोरंजक और प्रसंशनीय आह्वाहन करता लेख पढ़कर अच्छा लगा आभार | आप गंभीर लेखों के साथ मनोरंजक और व्यंग लेखों और कविताओं में भी अच्छी निपुदाता रखते हैं | बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा:

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीय प्रीतम जी . ..विनम्रता के साथ कहना चाहता हु की .ये कहानी नहीं है ... आपकी बाते और सुझाव सही है हमें स्वयं ही जागरूक रहना पड़ेगा .. लेकिन मै आपको बताना चाहूँगा की हमारे देश में कई लाख करोण की मात्रा में जाली नोट है ... और तमाम सरकारी दावो के बावजूद इनकी तस्करी और आवाजाही जारी है ... आपके द्वार बताई गई सावधानिय हर कोई नहीं कर सकता .. क्योकि हर किसी के मोबाईल फोन में कैमरे नहीं है....जहा तक बैंको की बात है तो ये बात हम सभी जानते है और लगभग हर सप्ताह पढ़ते है खबरों में की अमुक बैंक के ATM से नकली नोट मिला ... ऐसी घटनाएं आये दिन होती है... कितने बैंको के खिलाफ कार्यवाही हुई है ...? आम ग्राहक ये मान कर चलता है की बहार किसी से लेने में नकली नोट मिलते है . उसे बैंको पर विश्वाश है .... मुख्य बात ये है की अगर कोई अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझकर उस नकली नोट को बैंक में ले जाए .. तो उस नागरिक के प्रति सरकार या बैंक का क्या फर्ज होने चाहिए ... क्योकि नकली नोट वापस करने पर या बैंक में देने पर उसे तो बदले में कुछ भी नहीं मिलता ..उलटे आर्थिक हानी हुई सो हुई पुलिस का चक्कर अलग से फस सकता है .... पर्तिक्रिया और सुझावों के लिए धन्यवाद अब मै सतर्क हु इस मामले में .. प्रयास करता हु की बड़े नोट ही न लू.. .. ATM में इतनी भीड़ होती है की अगर आप वह कैमरा सेट करने लगे तो लोग बहार से गालिया देना शुरू कर देंगे ....वास्तव में ये सभी उपाय नहीं है .. इसका उपाय है जाली नोटों की तस्करी में पकडे जाने वालो पर कठोरतम सजा का प्रावधान हो जैसे चीन या अरब देशो में है ...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

आदरणीय डा साहब ...अभिवादन...... मै एक बात नहीं समझ पाता हु की ...आखिर कांग्रेस सरकार और कुछ और तथाकथित वर्ग विशेष का विशेष ख़याल रखने वाली पार्टिया अपने अन्दर नहीं झाकती क्या ...मै भाजपा से ज्यादा सांप्रदायिक इन्हें मानता हु ये तो साफ़ साफ़ बंटवारे की और भारतीय समाज को दो भागो में बांटने की शाजिश रची जा रही है .... क्या कांग्रेस ने सोचा की लाल चौक और तिरंगे पर इस हद तक जाकर विरोध करने का क्या परिणाम होगा और अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर देश की क्या छवि बनेगी... इस देश के प्रतिनिधि किसी हिस्से में राष्ट्रध्वज फहराने पर ही एकमत नहीं हो रहे.... दुखद किन्तु सत्य ही की इस प्रकरण से कश्मीर में अलगाववाद को गुणात्मक मजबूती मिलेगी... और अंतर्राष्ट्रीय मंचो में कश्मीर भारत का नहीं बल्कि भारत में भी एक विवादित मुद्दा माना जायेगा .. मैंने कोई काल्पनिक कथा नहीं लिखी ... ये वास्तविक बात चित के अंश थे जो एक आम कश्मीरी से हुई थी और मै इस नतीजे पर पंहुचा हु की हमारी सरकारे कश्मीर पर पुरे राष्ट्र के सामने एक भ्रमजाल सा बनाये हुए है ...... आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी ! एक ज्वलंत समस्या पर काल्पनिक खानी द्वारा प्रकाश डाल कर आपने सराहनीय लेख लिखा है | ये स्थिति तब पैदा होती है जब हम नोट को बारीकी से नहीं देखते | बैंक से नोट लेते ही एक एक को उन सारे पहलुओं से परखना चाहिए और अगर शक है तो वहीं बैंक काउंटर पर ही बदलना चाहिए | इस स्थिति में अगर आप चाहें तो बैंक के खिलाफ कानूनी करवाई भी होगी और बैंक के अन्दर जो virus इस धंदे में लगा है वो पकड़ा जायेगा | अगर आप ATM से निकाल रहे हों तो मशीन के सामने अपने मोबाइल का कैमरा चालू करके निकालें जिस पर नोटों के नम्बर आने चाहियें | इस तरह आप ये साबित कर सकेंगे के ये नोट ATM से ही निकला था | थोडा झंझट तो है पर अगर हर व्यक्ति सावधान रहे तो कुछ हद तक जाली नोट का काला कारोबार रोका जा सकता है | ये चीजें प्रगति के side effects हैं , होते ही रहेंगे, नई पीढ़ी के बीच कुछ ऐसे तत्व पैदा होते ही रहेंगे जो काले बाजार की पैदाईश हैं | इस में जादातर पुलिस और नौकरशाहों की संतानें मिलेंगी | दाऊद भी तो एक पुलिस वाले का बेटा है !

के द्वारा:

मित्र आपका आक्रोश अनुचित नहीं है .. राजनैतिक लाभ के लिए ऐसे बहुत से काम नेताओं द्वारा किये जाते है ..लेकिन यह एक बात आप ही बताये जब लाल चौक पर अलगावादी पकिस्तान का झंडा फहरा देते है तब कोई इतना बड़ा मुद्दा क्यों नहीं बनता .. ये तिरंगा यात्रा राजनैतिक थी तो राजनैतिक ही सही ..पुरे देश को हर पार्टी को इसमें शामिल होना चाहिए था ताकि अलगाववादियों को ये पता चले की पूरा देश इस मुद्दे पर एक मत है... इस तरह के विरोध पर तो पूरी दुनिया में एक गलत सन्देश गया है की कश्मीर मुद्दे पर भारत के ही लोग विभाजित है.... क्या ये ठीक है हमने खुद ही कश्मीर को विवादित बता कर पकिस्तान को एक मौका दे दिया है ...अधिकांश लोग कह रहे है की लाल चौक क्यों... मई कहता हु की लाल चौक भी क्यों नहीं ... आखिर तिरंगा फहराना है कोई खाई तो नहीं बनाना है ......... आपने पढ़कर प्रतिक्रिया दी इसके लिए आभार

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा:

आदरणीय शैलेन्द्र जी ... आपकी बात से मै सहमत हु .. लेकिन लाल चौक पर १९९३ की घटना के बाद एक नकारात्मक सन्देश भारतीय सेना और सरकार के विरुद्ध कश्मीरी जनमानस में गया जिसे इन अलगाववादियों ने भुनाया है और वह की अवाम को भारत के खिलाफ भड़काने में खूब प्रयोग किया है... आपको जानकारी होगी की उसी लाल चौक पर पकिस्तान का झन्डा ये अलगावादी फहरा चुके है ............. हम लाल चौक को उस गलती के प्रायश्चित के रूप में ले सकते थे .. सरकार के लोग और भाजपा के लोग वह जाते कश्मीरी अवाम से उस घटना पर खेद प्रकट करते और तिरंगा फहरा कर उन मुट्ठी भर सियारों को ये सन्देश देते की कश्मीर पर कोई विवाद नहीं है वह पूरी तरह हमारा है और हम उसके है ... सवाल यही है की श्रीनगर ठीक है ... तो लाल चौक पर क्यों नहीं..?.. खैर ये मामला शांत हो गया पर सरकार ने जो रवैया अपनाया था इसपर वह शर्मनाक ही कहा जायेगा.. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हु

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

निखिल जी , नमस्कार , आपने गणतंत्र -दिवस पर एक बेहतरीन आलेख लिखा उसके लिए साधुवाद ! दरअसल आजादी के बाद इस देश की बागडोर जिन हाथो में थमाया गया वे विदेशी संस्कृति में पले-बढे तथा पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और विकास का मतलब बस शहरो के विकास तक सीमित रख कर चले इस लिए गाँव और कृषि उपेक्षित होते चले गए और यह सिलसिला आज तक चल ही रहा है नतीजा शहर और गाँव के बीच फासले बढ़ते ही जा रहे है एक कृषि -प्रधान देश होने के बावजूद हमें बाहर से अनाज मंगवाना पड़ रहा है ! डाक्टर ,इंजीनियर की फ़ौज तैयार हो रही है मगर वे मोटी कमाई तथा सुविधाभोगी हो जाने के कारण गाँव में जाना नहीं चाहते पूरी व्यवस्था में आमूल -चूल परिवर्तन की आवश्यकता है तभी गणतंत्र का मतलब सार्थक होगा !

के द्वारा:

आदरणीय निखिल जी ! सादर अभिवादन ! आप ने बिलकुल सही प्रश्न उठाया है और उचित आह्वाहन किया है .......... हम सब लाल चौक चलना चाहिए ... क्योंकि वर्तमान सरकार का रवैया निंदनीय है, क्योंकि ये हमेश झुकाने का प्रस्ताव रखती रही है, अगर हम झुकते ही रहे हो हमें बार बार झुकाया जाएगा, हर बात के लिए झुकाया जाएगा | आज लाल चौक न जाओ कल दिल्ली न जाओ, परसों अपने घर कार्यालय में झण्डा मत फहराओ .. क्या है ये सब, ये लोग वोट बैंक की राजनीति में लगे हुए हैं, इनको भविष्य से कुछ नहीं लेना, या वहां तक सोच ही नहीं पा रहे हैं .... और अलगाववादी शक्तियों से कब तक भागते रहेंगे ? हमें उनके सामने आना ही होगा .. "शठे शाठ्यम समाचरेत" अच्छे लेख के लिए आभार

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey Shailesh Kumar Pandey

वाकई काग्रेस की ऐसे झुकना देश के लिए शर्मनाक है...अगर आज अलगाववादियों के आगे झुक कर यह निठल्ली और लाचार सरकार लाल चौक पर झंडा फहराने से रोक रही है तो संभव है कल तो कुछ अलगावादियों के दबाव में सोनिया और मनमोहन सिंह लाल किला पर भी झंडा नही फहराएंगा... मैं आपके विचारों से सहमत हू..... मुझे तो लगता है आज अमत अब्दुला और कश्मीर के अलगावादियों की ताकत भारत के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा है...न जानें कैसे फोब्स पत्रिका ने सोनिया को सबसे शक्तिशाली महिला की लिस्ट में शामिल किया...... ऐसी कमजोर सरकार न आज से पहले कहीं देखी थी और उम्मीद है न ही आज के बाद्फ कभी आएंगी. भ्रष्टाचार इन लोगों से स6भलता नहीं, महंगाई कम नहीं होती. नक्सलवाद और अलगाववाद भी बढ+ रहा है..यार ये सरकार सिर्फ नाम की है.....कुछ नहीं हो सकता भगवान इस सरकार का कार्यकाल जल्दी खत्म कर...

के द्वारा: राहुल राहुल

राजीव जी ... निश्चित रूप से .... अब सबक सिखाने का समय अ गया है .... इस बार सड़क दिखानी पड़ेगी...... अब मुझे लगता है सभी की समझ में आ जाना चाहिए की ये छदम सेकुलर लोमड़िया शेरो की खाल में आज सत्ता पर पहुच गई है और इनका निशाना हिन्दू संगठन नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की आत्मा है ..... शर्म आती है की राहुल गाँधी ,दिग्विजय सिंह .. जैसे लोग इस देश की संसद में बैठते है .... इन अधकचरी समझ वाले राजनीतिज्ञ को ये भी पता नहीं की हिन्दू आतंकवाद का जो राग ये पूरी दुनिया को सुना रहे है ..उसे उनकी ही सरकारी एजेंसिया नकार रही है .... इस पर कोई भी पुख्ता सबूत उनके पास नहीं है ... और वो विदेशो में इसका रोना रो रहे है ... उन्हें ये नहीं पता की वे देश को कितनी बड़ी मुसीबत में धकेल रहे है .... और हिन्दू मुस्लिम समाज में एक दिवार खड़ी कर रहे है ... अविश्वाश के जिस बीज को जिन्ना ने बोया था उसमे खाद पानी डाल रहे है ..और ये वृक्ष एक दिन राष्ट्र की ही मिटटी को उखाड़ देगा........... वोट की राजनीती में इतनी गिरावट कभी देखने को नहीं मिली ..जितनी आज ये सेकुलरवाद के नाम पर दिख रही है... राहुल गांधी राजनीती में कितने अपरिपक्व है ये तो स्पष्ट है ..बेहतर ये होगा की कांग्रेस उनकी ब्रांडिंग करने की जगह भारत को समझने की व्यवस्था करे... विश्व पटल पर एक बुरा सन्देश तो गया ही पकिस्तान को भी एक बड़ा अवसर हाथ लगा है ..और भविष्य में इन कथनों का बुरा प्रभाव हमारे आतंरिक और वाह्य नीतियों पर पड़ेगा .. प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

प्रिय आकाश जी .शायद आपको मेरी बात बुरी लगी ....संभवतः मुझे उदाहरण कुछ और लेना चाहिए था.... मगर चातक जी और आप स्वयं बेहतरीन लेखक है और और आप जानते है की इस तरह के प्रयोगों से बाजार का तो भला हो जायेगा ..लेकिन हिंदी के साथ ये एक तरह का मजाक ही कहा जायेगा ..अंग्रेजी सिखने सिखाने का तर्क देना यहाँ उचित नहीं लगता इसके और भी तरीके हो सकते है ..किन्तु यदि आप को मेरी बात गलत लगी हो तो आप मुझे अल्पज्ञानी और बुद्धिहीन समझ कर क्षमा करे ..मेरा उद्देश्य आपको कष्ट पहुचना नहीं था आपकी कविता का प्रयोग मैंने इसीलिए किया ताकि आप समझ सके की ऐसी प्रयोगधर्मिता से हमारे साहित्य का सत्यानाश हो जायेगा.....कृपा करके इसके दूर गामी परिणामो पर ध्यान दे

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

प्रिय आकाश जी ..आपकी भावनाओं की क़द्र करता हु..और प्रतिक्रिया के लिए आभार प्रकट करते हुए सबसे पहले ये कहना चाहूँगा की भाषा आदर और निरादर की सीमा से परे होती है यहाँ आदर सम्मान की बात नहीं है ... लेकिन हमाप और आने वाली पीढ़िय ही वो नेक्स्ट है जिसकी बाते हो रही है... मुझे हैरत है आपने इसका समर्थन की जबकि आप स्वयं एक बेहतरीन कवी और गजलकार है... क्या आप अपनी नै गजल को इस रूप में देखना पसंद करेंगे......?? हसीन मोमेंट्स की पार्टी मना लीजिये, अपनों की नफरत भुला दीजिये, किसी भी मोड़ पर स्टॉप हो जाए ये लाइफ अगर, दो ड्रॉप वाइन की लगा लीजिये.. मुझे क्षमा करे मेरा उद्देश्य केवल ये समझाना था की भाषा के साथ ऐसे प्रयोगों से दूरगामी प्रभाव पड़ते है .. मुश्किल नहीं है की कल को ऐसे प्रयोग कुछ आधुनिक उत्साही लोग करे...और आपका हिंदी साहित्य इन नए प्रयोगों में अपनी खूबसूरती खो दे .... कोई भी पाठक आपकी गजल की पंक्तियों को इस रूप में पढ़कर आनंद नहीं पा सकता ......इससे अंग्रेजी में कमजोर लोग अपने ग्रामर को जितना आता होगा वो भी तबाह कर लेंगे और हिंदी का जो स्वरुप बिगड़ेगा सो ...... अलग..... आपसे विनम्र निवेदन है की इसपर एक बार पुनः विचार करे....

के द्वारा:

प्रिय चातक जी ..इस तर्क से मै पूरी तरह असहमत हु ..की हिंदी से अंग्रेजी सिखने के लिए ये प्रयोग उचित है.... अंग्रेजी सिखने के कई तरीके है मगर जो उदाहरण मैंने दिया है .... उसे आप न तो हिंदी के लिए उचित कह सकते है न अंग्रेजी के लिए..... क्योकि ये एक प्रकार की खिचड़ी भाषा है..... और ये खिचड़ी भाषा न तो आपको हिंदी ही सिखने देगी न ही अंग्रेजी.... एक उदाहरण ले..... आजकल जब हम सेल फोन पर सन्देश लिखते है तो अंग्रेजी में ही..... देखिये क्या करते है... hi frends vry gd mrng.... i wl cal u latr,   i m buzy ... bt i came vry soon ... tc .. चातक जी ये भी एक प्रयोग ही है मगर ये धीरे धीरे आदत बन चूका है और इस तरह से हम एक भाषा के साथ मजाक कर रहे है.... जहा तक हिंदी से अंग्रेजी सिखने की बात है.... ये आदत हिन्लिश वाली आगे बहुत बुरा रूप ले लेती है.....और आप जानते होंगे की विश्वा में अभी तक ग्रामर के हिसाब से सबसे शुद्ध अंग्रेजी भारत में ही बोली जाती है.... मै इसे बेहद बुरा मानता हु.... आई नेक्स्ट को आसान अंग्रेजी भाषा में निकाल दिया गया होता तो कोई बात नहीं ..लेकिन ये प्रयोग एक प्रकार का बेहूदा मजाक ही है....

के द्वारा:

प्रिय निखिल जी, आपकी पीड़ा सही है ! परन्तु जैसे की चातक जी ने कहा है अगर वह सत्य है तो यह एक अच्छा प्रयास है ! मैं भी इसे पढना चाहूँगा ! क्योंकि विदेशी भाषा में मेरा हाथ भी तंग है ! फिर जहाँ तक हिंदी के मजाक उड़ाने की बात है तो हमरे नेता और सरकारी संस्थाए ये काम बखूबी निभा रही है ! इसी सन्दर्भ में मेरी कविता इसी मंच पर "हम हिंदी दिवस हैं मनाते" आई थी ! शायद अपने पढ़ी होगी ! यहाँ आपको मैं एक मजेदार बात बताना चाहता हूँ .! 1966 में मुझे बनारस हिन्दू विश्यविद्यालय (BHU )में एडमिशन मिला था ! मैं बस स्टैंड से एक रिक्शा पर बैठा और रिक्शा वाले को विश्यविद्यालय चलने को कहा ! वो रिक्शा वाला लगभा एक घंटा तक मुझे घुमाता रहा ! मैंने हार कर उससे पूछा _ क्या यूनिवर्सिटी इतनी दूर है ! तो रिक्शा वाले ने हैरान होकर पूछा _ क्या आपको यूनिवर्सिटी जाना है ? जब मैंने हां कहा तो रिक्शा वाला बोला आप मुझे पहले ही हिंदी में बता देते की आपको यूनिवर्सिटी जाना है मैं तो वह से तीन बार गुजर चूका हूँ ! आप तो इंग्लिश में विश्यविद्यालय-विश्यविद्यालय कह रहे थे इसी लिए मैं आपको घुमाता रहा ! आशा है आप मेरा आशय समझ गे होंगे ! राम कृष्ण खुराना

के द्वारा: R K KHURANA R K KHURANA

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

स्नेही श्री निखिल जी, हिंदी भाषा के लिए आपका प्रेम देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई| निश्चय ही किसी भी भाषा के साथ किया गया मज़ाक अशोभनीय के दर्जे में ही रखा जाएगा लेकिन आई-नेक्स्ट भाषा के साथ किसी भी तरह की फूहड़ता नहीं करता है| मैंने इस पत्र को देखा और पढ़ा है और मैं इसे जागरण का एक सराहनीय कदम मानता हूँ| ये एकमात्र ऐसा पत्र है जो अंग्रेजी से हिंदी या हिंदी से अंग्रेजी सीखने वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं| कमोवेश हिंदी से अंग्रेजी सीखने वालों को ध्यान में रखते हुए इस पत्र का प्रकाशन किया जा रहा है| मैं स्वयं भी ऐसे किशोरों और युवको को आई-नेक्स्ट पड़ने की सलाह देता हूँ जो अंग्रेजी बोलना चाहते हैं| आपको बुरा लगा क्योंकि आपने इसे जागरण का समाचार पत्र समझ लिया है लेकिन ऐसा नहीं है ये एक ऐसा पत्र है जो सर्वोत्तम तरीके से language switch over में लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है| आप इसे इसके उपयोग की दृष्टि से देखें तो आप पायेंगे कि दैनिक जागरण की तरह ये पत्र भी लाजवाब है| आपने इस ब्लॉग को मंच पर लाकर अच्छा किया क्योंकि बहुत से लोगों को ये भ्रम हो सकता है कि जागरण भाषा के साथ मज़ाक कर रहा है जबकि ऐसा बिलकुल नहीं| विनम्रतापूर्वक आपका चातक

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' प्रिय मित्र निखिल पाण्डेय जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

के द्वारा: